अमरीश सरकानगो

एक सौ बत्तीस करोड़ की जनसंख्या वाले हमारे देश में हर साल लाखों मौतें समय पर रक्त या प्रत्यारोपण के लिए अंग न मिलने की वजह से होती हैं। लाखों लोगों को दुर्घटना, सर्जरी या किसी बीमारी की वजह से रक्त की दरकार होती है। 1 करोड़ 20 लाख यूनिट रक्त की आवश्यकता हर साल अस्पतालों में होती है और रक्त दानकर्ताओं से पूर्ति सिर्फ नब्बे लाख यूनिट की होती है। इस तीस लाख यूनिट रक्त की कमी के कारण हमारे देश में हर साल हजारों जानें चली जाती हैं। इतनी विशाल आबादी में करोड़ों ऐसे स्वस्थ लोग हैं जो नियमित रूप से रक्तदान कर सकते हैं, मगर आमजन में जागरूकता की कमी और सरकार की उदासीनता की वजह से ऐसा नहीं हो पा रहा। अगर दो फीसद भारतीय भी नियमित रक्तदान करें, तो भारत में रक्त की कमी दूर हो सकती है। एक आम स्वस्थ आदमी दो महीने में एक बार रक्तदान कर सकता है। उसकी जगह नया रक्त बहुत जल्दी ही शरीर में वापस बन जाता है। अंग प्रत्यारोपण में तो हमारा देश और भी पिछड़ा हुआ है। हमारे यहां मृत्यु के बाद अंग-दान करने का आंकड़ा बेहद कम है। पढ़े-लिखे जागरूक लोगों में भी मृत्यु के बाद अंगदान करने के प्रति जबर्दस्त हिचक देखी जाती है, तो फिर बाकी लोगों से क्या उम्मीद की जाए।

अभी भारत में तकरीबन अस्सी लाख लोग कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित है, यानी जिनकी आंखों की रोशनी कॉर्निया प्रत्यारोपण से वापस आ सकती है। हर साल हमारे देश में एक करोड़ लोगों की किसी न किसी वजह से मृत्यु हो जाती है। इनमें से लाखों की संख्या में ऐसे लोग भी होते हैं जिनकी आंखें मृत्यु के समय पूरी तरह से प्रत्यारोपण के काबिल होती हैं। नवीनतम तकनीक से एक कॉर्निया से एक से ज्यादा आंखों की रोशनी लाई जा सकती है। आंकड़ों के हिसाब से तो देश में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के केस हर साल कम होने चाहिए, पर हकीकत में, जागरूकता की कमी के चलते, यह आंकड़ा हर साल बढ़ता ही जा रहा है।
हर साल देश में तकरीबन डेढ़ लाख लोग विभिन्न दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग होते हैं जिनके कई अंग बिलकुल ठीक कार्य कर रहे होते हैं और प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं। बीमारी के अलावा अन्य कारणों से भी जो मौतें हर साल होती हैं उनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग होते हैं जिनके कई अंग प्रत्यारोपण के लायक होते हैं।हर साल भारत में तकरीबन साठ हजार लोगों को लीवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है जो जीवित इंसान के लीवर के हिस्से से भी पूरी हो सकती है। मगर असल में लीवर प्रत्यारोपण होते हैं सिर्फ पंद्रह सौ के करीब। हर साल लगभग दो लाख लोगों को किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, मगर होते हैं सिर्फ पांच हजार प्रत्यारोपण। हर साल करीब पांच हजार लोगों को हृदय प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है मगर असल में हो पाते हैं सिर्फ सौ के करीब प्रत्यारोपण।

अंग प्रत्यारोपण के लिए पूरे देश में अच्छी आधारभूत सरंचनाओं वाले अस्पतालों की बेहद कमी है। सरकार की तरफ से भी इस क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय पहल नहीं हुई है। चूंकि एक व्यक्ति के ब्रेन-डेड होने पर और अंग प्रत्यारोपण के लिए मरीज के दूसरे अस्पताल या शहर में होने पर सिर्फ चार-पांच घंटों के भीतर अंग प्रत्यारोपित करना होता है, इसीलिए ऐसे वक्त के लिए ग्रीन कॉरिडोर अर्थात सारा ट्रैफिक रोक कर अंग लेकर जाने वाली एम्बुलेंस को जगह देने का कानून बनाना होगा। हर शहर में अच्छे अस्पतालों का सरकार द्वारा निरीक्षण करके उन्हें अंग-प्रत्यारोपण करने के लाइसेंस देने की प्रकिया सरल बनानी होगी। छोटी जगहों पर सरकारी अस्पतालों में जरूरत पड़ने पर अंग-प्रत्यारोपण के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा तैयार करना होगा।
गंभीर रूप से बीमार मरीज के परिजन अंगदान से इसलिए भी डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा संकल्प करने पर अस्पताल वाले मरीज को बचाने का पूरा प्रयास नहीं करेंगे। इसीलिए हर शहर में ऐसे स्वतंत्र विशेषज्ञ चाहिए जो अस्पताल द्वारा संपर्क करने पर तुरंत पहुंच कर मरीज को समय पर ब्रेनडेड घोषित कर सकें। मृत व्यक्ति के अंग-दान करने पर संबंधियों के राजी होने पर सरकार को उनके अस्पताल और मेडिकल बिल में छूट या पूरी राशि प्रोत्साहन के रूप में देने पर भी विचार करना होगा। कई देशों में अंग प्राप्तकर्ता ही अंगदान करने वाले का सारा चिकित्सा-खर्च उठाता है। कई देशों में एक बार अंग शरीर से बाहर निकालने के बाद वह सार्वजनिक संपत्ति होती है और उस देश की सरकार की यह जिम्मेदारी होती है कि उसे प्राप्तकर्ता तक अविलंब पहुंचाया जाए।
इजराइल, सिंगापुर और चिली जैसे छोटी जनसंख्या वाले देशों में अंग दानकर्ताओं की संख्या और भी कम है। पर वहां की सरकारों ने अंगदान को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ नीतियां बनाई हैं। इजराइल की संसद ने 2008 में अंग प्रत्यारोपण कानून पास किया। इस कानून के तहत जीवित अंगदानकर्ता को पांच साल तक वित्तीय सहायता का प्रावधान है। इससे मिलते-जुलते नियम सिंगापुर, आस्ट्रेलिया, ईरान, कनाडा, न्यूजीलैंड, आयरलैंड और सऊदी अरब में भी हैं। इजराइल और सिंगापुर में अगर कोई नागरिक या उसके परिजन लिखित में मृत्यु के बाद अंगदान करने का संकल्प लेते हैं तभी वे जरूरत पड़ने पर अंगदान प्राप्त करने के लिए प्राथमिकता में होंगे। ऐसा न करने पर अगर उन्हें कभी अंगदान की आवश्यकता होगी, तो उनका नंबर सबसे आखीर में आएगा। इस नीति से भी इन देशों में अंगदान का प्रतिशत बढ़ा है।

ईरान में एक सामाजिक संस्था ‘डाटपा’ (डाइलेसिस एंड ट्रांसप्लांट पेशेंट्स एसोसिएशन) उन लोगों के लिए दानकर्ता ढूंढ़ती है जिन्हें कहीं से अंगदान मिलने की उम्मीद नहीं है। ईरानी सरकार अंगदान करने वालों को बारह सौ डॉलर और एक साल के स्वास्थ्य-बीमा का लाभ देती है। अंगदान प्राप्तकर्ता भी अपनी तरफ से दानकर्ता को 2300 से 4500 डॉलर देता है। अगर प्राप्तकर्ता आर्थिक रूप से अक्षम होता है तो चैरिटेबल संस्थाएं पूरी मदद करती हैं।हमारे देश में अंग प्रत्यारोपण के लिए मरीजों का पंजीकरण और डेटाबेस तैयार करना होगा और सारे देश के प्रमुख अस्पतालों को आपस में नेटवर्क से जोड़ना होगा ताकि दानकर्ता और आपूर्तिकर्ता के बीच अविलंब संपर्क हो सके। सारे ब्लड बैंकों को भी आपस में जोड़ना होगा ताकि एक जगह का अतिरिक्त रक्त दूसरी जगह फौरन काम आ सके। केंद्र और राज्य सरकारों को बड़े स्तर पर अंगदान और रक्तदान को प्रोत्साहित करने के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर मुहिम चला कर आम जनता का ध्यान इस ओर खींचना होगा। बड़े अस्पतालों और ब्लड बैंकों को नियमित रूप से कॉलेजों और दफ्तरों में जाकर लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करना होगा। बड़े शहरों में हर हफ्ते जगह-जगह शिविर लगाने होंगे ताकि रक्दान करना लोगों की आदत में शुमार हो जाए।

कई बार देखने में आया है कि किसी की मृत्यु के बाद मृतक के परिजन उसकी देह अंगदान के लिए देना चाहते हैं मगर सुविधाओं के अभाव में अस्पताल ने देह लेने से इनकार कर दिया। बड़े अस्पतालों को हरदम तैयार रहना होगा ताकि जब भी कोई ब्रेनडेड मरीज का केस हो, तो तुरंत उनके अंग प्रत्यारोपित होने की तैयारी रहे। लोगों के मन से यह भ्रामक धारणा भी दूर करनी होगी कि मृत व्यक्ति के अंग निकलना धर्म और प्रकृति के विरुद्ध है। उन्हें समझाना होगा कि अंगदान और रक्तदान परोपकार का काम है।