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हाल ही में तुर्की में तख्तापलट की कोशिश नाकाम होने के बाद सोशल मीडिया के एक धड़े ने यह आशंका जताई है कि भारत में भी ऐसा हो सकता है। आइए आपको बताते हैं ऐसी 9 वजहें, जो साबित करते हैं कि भारतीय सेना कभी देश का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की कोशिश नहीं करेगी। (EXPRESS ARCHIVE)
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सामान्य तौर पर सेना तख्तापलट करती है। ज्यादातर तख्तापलट वरिष्ठ स्तर के सैन्य अफसरों के इशारे पर होते हैं। अब तक हुए तख्तापलट मुख्य रूप से छोटे और केन्द्रित देशों में हुए हैं। जहां राजधानी ही सबसे महत्वपूर्ण शहर होता है। लेकिन भारत के मामले में सिर्फ दिल्ली पर कब्जा कर कुछ नहीं होगा। राज्य सरकार चलती रहेंगी और केन्द्र सरकार पूरे देश में अफसराें के जरिए मौजूद रहेगी। (EXPRESS ARCHIVE)
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भारतीय थलसेनाध्यक्ष का चयन निष्पक्ष, सम्मानित, गैर-राजनैतिक तरीके से किया जाता है। भारतीय सेना के अध्यक्ष मानव स्थितियों और मनोविज्ञान के माहिर होते हैं। वे सेना में लंबा समय बिताकर आते हैं और उनमें देशभक्ति का जज्बा कूट-कूटकर भरा होता है। इसके उलट, तख्तापलट करने वाले देशभक्तों की तरह शुरुआत करते हैं और बाद में ऊपर चढ़ने के लिए लालायित रहते हैं। भारतीय सैनिकों को इन दोनों स्थितियों और उसके परिणामों से ट्रेनिंग में ही रूबरू करा दिया जाता है। (EXPRESS ARCHIVE)
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अगर सेना का संगठनात्मक ढांचा देखें, तो जंग में लड़ने वाले अफसर ही तख्तापलट का नेतृत्व करते हैं। किसी एक अफसर के सभी तरह की सोच वाले अधीनस्थ अफसरों को मना पाना संभव नहीं। भारतीय सेना का रेजीमेंटल सिस्टम भी तख्तापलट की आशंका को बेहद कम कर देता है। सेनाध्यक्ष योजना बना सकते हैं कि लेकिन बिना गृह सचिव काे जानकारी दिए सेना को मूव करने का आदेश नहीं दे सकते। सारी वित्तीय शक्तियां भी डिफेंस मिनिस्ट्री के पास होती हैं। (EXPRESS ARCHIVE)
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अगर तख्तापलट होता है तो भी संविधान में प्रोटोकाल्स हैं जो उसे विफल बता सकते हैं। सिर्फ संसद पर कब्जा कर लेने से तख्तापलट नहीं होगा। अगर दिल्ली में ऐसा होता भी है तो बाकी रिजर्व पैरामिलिट्री फोर्सेज और कमांड सेटर गृह मंत्रालय के साथ मिलकर सत्ता फिर से हासिल कर सकते हैं। किसी भी तख्तापलट को कुछ महीनों में पलटा जा सकता है। (EXPRESS ARCHIVE)
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अमेरिका, रूस और चीन की सेनाओं में सैनिक कहीं भी जगह खाली होने पर भेज दिए जाते हैं। इन सेनाओं में एक रेजीमेंट सिर्फ एक जंगी यूनिट भर होती है। जबकि भारतीय सिस्टम में सैनिक अपनी रेजीमेंट के लिए ही काम करता है। इसलिए सैनिक की वफादारी अपने रेजीमेंट के प्रति ज्यादा होती है। इसलिए किसी भी बड़े सैन्य अफसर के लिए विभिन्न रेजीमेंट के अफसरों को अपने ऑर्डर मानने के लिए राजी करना बेहद मुश्किल हो जाता है। अभी तक रेजीमेंटल सिस्टम वाली किसी सेना ने तख्तापलट नहीं किया है। (EXPRESS ARCHIVE)
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मीडिया और सिविल सोसायटी के मजबूत होने की वजह से सरकारों को अपनी गतिविधियों पर नियंत्रण करना पड़ता है, इसलिए कभी तख्तापलट की जरूरत ही नहीं पड़ी। इसके अलावा भारतीय सेना में हर राज्य के लोगों का प्रतिनिधित्व है। इसलिए तख्तापलट की आशंका कम हो जाती है। पाकिस्तानी सेना में 70 फीसदी से ज्यादा सैनिक पंजाब प्रान्त से आते हैं। (EXPRESS ARCHIVE)
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साल 2012 में, अखबारों ने खबर दी कि आर्मी की टुकड़ियों ने दिल्ली की तरफ मार्च किया था। तत्कालीन जनरल वीके सिंह ने कहा था कि 'क्या बकवास है।' भारतीय सेना शुरू से ही बेहद अनुशासित रही है, वह ऐसा कदम कभी नहीं उठाएगी। भारतीय सेना ने कभी भी राजनैतिक मामलों में दखल नहीं दिया। इसमें किसी तरह के बदलाव की गुंजाइश भी नहीं है। (EXPRESS ARCHIVE)
भारतीय संविधान में शक्तियों का बंटवारा बहुत सोच-समझकर किया गया है। राष्ट्रपति तीनों सेनाओं के सुप्रीम कमांडर हैं, प्रधानमंत्री उनके मुख्य सलाहकार और फिर तीनों सेनाध्यक्षों का नंबर आता है। एक सेनाध्यक्ष दूसरी सेना पर हुकुम नहीं चला सकता। अगर ऐसा होता भी है तो सुप्रीम कमांड राष्ट्रपति के हाथ होती है जो प्रधानमंत्री की सलाह पर पूरे देश की सेना को तख्तापलट के खिलाफ लड़ने को कह सकते हैं। (EXPRESS ARCHIVE) -
ब्रिटिश काल के दौरान सेना को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था। सेना का दखल नीतिगत मामलों में भी हुआ करता था। तब कमांडर-इन-चीफ ही रक्षा मंत्री हुआ करता था। लेकिन आजादी के बाद पीएम बने नेहरू ने रक्षा बजट में कई कटौतियों की। तब भारतीय सेना के पहले चीफ, फील्ड मार्शल करियप्पा ने सार्वजनिक तौर पर सरकार की बुराई की थी। लेकिन उन्हें चुप करा दिया गया। 1958 में पाकिस्तान में तख्तापलट होने के बाद भारतीय सेना को नियंत्रण में रखा जाने लगा। (EXPRESS ARCHIVE)