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कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जहां कहानी का सबसे बड़ा विलेन कोई इंसान या राक्षस नहीं, बल्कि हालात होते हैं। किरदार ऐसी जगह या स्थिति में फंस जाते हैं जहां से निकलना लगभग नामुमकिन लगता है। इन फिल्मों में किरदार सिर्फ बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि अपने डर, अकेलेपन और समय के खिलाफ भी लड़ते हैं। (Still From Film)
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सीमित लोकेशन, घुटन भरा माहौल और लगातार बना रहने वाला तनाव दर्शकों को आखिर तक बांधे रखता है। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ शानदार फिल्मों के बारे में, जहां ‘फंस जाना’ ही पूरी कहानी की आत्मा है। (Still From Film)
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Buried (2010)
यह फिल्म क्लॉस्ट्रोफोबिया का चरम उदाहरण है। इराक में काम करने वाला अमेरिकी ट्रक ड्राइवर पॉल कॉनरॉय अचानक खुद को जमीन के नीचे एक लकड़ी के ताबूत में बंद पाता है। उसके पास सिर्फ एक लाइटर, मोबाइल फोन और कुछ छोटी-छोटी चीजें हैं। पूरी फिल्म लगभग एक ताबूत के अंदर घटती है, लेकिन तनाव एक पल के लिए भी कम नहीं होता। ऑक्सीजन खत्म होने का डर, समय की कमी और मदद न मिलने की आशंका इस फिल्म को बेहद बेचैन कर देने वाला अनुभव बनाती है। यह फिल्म दर्शक को भी उसी ताबूत में कैद होने का एहसास कराती है। (Still From Film) -
127 Hours (2010)
यह फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है। एक पर्वतारोही एरॉन राल्स्टन यूटा की पहाड़ियों में अकेले ट्रेकिंग करते समय एक चट्टान के नीचे फंस जाता है। कई दिनों तक बिना पानी और भोजन के फंसे रहने के बाद वह एक ऐसा फैसला लेता है जो इंसानी जिजीविषा की मिसाल बन जाता है। ये फिल्म दिखाती है कि जब इंसान पूरी तरह अकेला हो, तब भी जीने की इच्छा कितनी ताकतवर हो सकती है। (Still From Film) -
Phone Booth (2002)
एक साधारण सा फोन कॉल अचानक जानलेवा बन जाता है। न्यूयॉर्क की एक फोन बूथ में खड़ा व्यक्ति एक अनजान स्नाइपर के निशाने पर आ जाता है। अगर वह बूथ छोड़ेगा तो उसे गोली मार दी जाएगी। खुली सड़क पर खड़े होकर भी किरदार पूरी तरह फंसा हुआ है। पूरी फिल्म इसी एक जगह पर टिकी रहती है, जहां मानसिक दबाव, डर और नैतिक सवाल कहानी को आगे बढ़ाते हैं। यह फिल्म दिखाती है कि फंसाव सिर्फ बंद कमरे में ही नहीं, खुले में भी हो सकता है। (Still From Film) -
The Descent (2005)
छह महिलाएं एक अनजान गुफा प्रणाली में एडवेंचर के लिए जाती हैं, लेकिन अंदर जाकर रास्ता भूल जाती हैं। तंग सुरंगें, अंधेरा और रहस्यमय जीव इस फंसाव को और भी डरावना बना देते हैं। ये सिर्फ हॉरर नहीं, बल्कि इंसानी घबराहट और सर्वाइवल इंस्टिंक्ट की भी कहानी है। यह फिल्म शारीरिक डर के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक भय को भी बखूबी उभारती है। (Still From Film) -
Room (2015)
यह फिल्म सिर्फ एक बंद कमरे की कहानी नहीं, बल्कि कैद में पले-बढ़े एक बच्चे की दुनिया है। एक मां और उसका बेटा सालों तक एक छोटे से कमरे में बंद रहते हैं। बच्चे ने कभी बाहर की दुनिया देखी ही नहीं होती। बाहर की दुनिया बच्चे के लिए एक अनजाना ग्रह है। यह फिल्म सिर्फ फंसे होने की पीड़ा नहीं दिखाती, बल्कि आजादी के बाद की मानसिक चुनौतियों को भी बहुत संवेदनशील तरीके से पेश करती है। (Still From Film) -
Green Room (2015)
यह फिल्म एक अलग तरह का ट्रैप दिखाती है। एक पंक बैंड एक दूरदराज क्लब में परफॉर्म करता है, जहां वे एक हत्या के गवाह बन जाते हैं। इसके बाद नियो-नाज़ी स्किनहेड्स उन्हें एक ग्रीन रूम में घेर लेते हैं। क्लब के भीतर बंद दरवाजे, हिंसा और डर लगातार बढ़ता जाता है। यह फिल्म दिखाती है कि कैसे एक गलत जगह और गलत समय किसी को मौत के जाल में फंसा सकता है। (Still From Film)