सुुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को गवाहों के संरक्षण के लिए कार्यक्रम बनाने में एक निश्चित भूमिका निभानी चाहिए। कम से कम ऐसे संवेदनशील मामलों में यह कार्यक्रम जरूर बनाना चाहिए जिनमें राजनीतिक संरक्षण, बाहुबल और धनबल का प्रयोग होता है। ऐसा करने से मुकदमे दिशाहीन नहीं होंगे। गवाहों के पलट जाने के पीछे डराने-धमकाने को बड़ी वजह बताते हुए सुुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब गवाह अदालत के समक्ष सही गवाही नहीं दे पाते तो इसकी वजह से दोषसिद्धि की दर कम हो जाती है। लिहाजा कई बार तो खूंखार अपराधी भी दोषी साबित किए जाने से बच जाते हैं। न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय के पीठ ने कहा कि इससे आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास डगमगा जाता है। इसी वजह से गवाहों के संरक्षण को लेकर बहुत बातचीत होती है।

कई वर्गों से यह मांग की जाती रही है कि गवाह संरक्षण कार्यक्रम में व कम से कम राजनीतिक संरक्षण रखने वाले और बाहुबल व धनबल का इस्तेमाल कर सकने वाले लोगों से जुड़े संवेदनशील मामलों में सरकार की एक निश्चित भूमिका हो ताकि मुकदमे पटरी से नहीं उतरें और सच पराजित नहीं हो। पीठ ने फैसले में कहा कि यह सामान्य बात हो गई है और करीब करीब रोजाना की बात हो गई है कि आपराधिक मामलों में गवाह अपने बयान से पलट जाते हैं। अदालत ने एक विवाहित महिला से क्रूरता और हत्या के अपराधों के मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए चार लोगों की अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। आरोपियों को शुरू में निचली अदालत ने बरी कर दिया था लेकिन हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए महिला की ओर से अंतिम समय में दिए गए बयान के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया। आरोपियों ने 1999 में कथित तौर पर महिला को जला दिया था।

महिला के पति और उसके ससुरालीजनों ने हाई कोर्ट के निर्णय को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी और कहा था कि अंतिम समय में दिए गए बयान पर निर्भर रहने की कोई वजह नहीं बनती क्योंकि इसमें कुछ कमियां थीं। पुलिस ने महिला के बयान के आधार पर आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। सौ फीसद जल चुकी महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई थी।