न्यायपालिका और सरकार के बीच खींचतान के बीच भारत के प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर ने गुरुवार (1 दिसंबर) को कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया ‘‘हाईजैक’’ नहीं की जा सकती और न्यायपालिका स्वतंत्र होनी चाहिए क्योंकि ‘‘निरंकुश शासन’’ के दौरान उसकी अपनी एक भूमिका होती है। ठाकुर ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका न्यायाधीशों के चयन में कार्यपालिका पर निर्भर नहीं रह सकती। उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रशासन के मामलों में न्यायपालिका स्वतंत्र होनी चाहिए जिसमें अदालत के भीतर न्यायाधीशों को मामलों को सौंपना शामिल है, जब तक न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होगी, संविधान के तहत प्रदत्त अधिकारी ‘‘बेमतलब’’ होंगे। प्रधान न्यायाधीश ठाकुर ने यह टिप्पणी ‘स्वतंत्र न्यायपालिका का गढ़’ विषयक 37वें भीमसेन सचर स्मृति व्याख्यान के दौरान कही। ठाकुर ने न्यायतंत्र से एकजुट होकर न्यापालिका की स्वतंत्रता को बचाए रखने के लिए एकजुट रहने के लिए कहा। ठाकुर ने कहा कि न्यायपालिका पर अंदर और बाहर से आक्रामकता का खतरा है और न्यायतंत्र को उसका एक सुर में विरोध करना चाहिए।
यह टिप्पणी उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बढ़ते तनाव के मद्देनजर महत्वपूर्ण है। देश के दोनों ही अंग एक-दूसरे पर न्यायाधीशों के रिक्त पद बढ़ाने के आरोप लगाने के साथ ही एक-दूसरे को ‘लक्ष्मणरेखा’ में रहने के लिए कह रहे हैं।
गौरतलब है कि 26 नवंबर को प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर ने उच्च न्यायालयों और न्यायाधिकरणों में न्यायाधीशों की कमी का मामला फिर से उठाया था। ठाकुर ने कहा था, ‘उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पांच सौ पद रिक्त हैं। ये पद आज कार्यशील होने चाहिए थे परंतु ऐसा नहीं है। इस समय भारत में अदालत के अनेक कक्ष खाली हैं और इनके लिये न्यायाधीश उपलब्ध नहीं है। बड़ी संख्या में प्रस्ताव लंबित है और उम्मीद है सरकार इस संकट को खत्म करने के लिये इसमें हस्तक्षेप करेगी।’ हालांकि, विधि एवं न्याय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने उसपर असहमति व्यक्त की थी। रविशंकर ने कहा था, ‘हम ससम्मान प्रधान न्यायाधीश से असहमति व्यक्त करते हैं। इस साल हमने 120 नियुक्तियां की हैं जो 2013 में 121 नियुक्तियों के बाद सबसे अधिक है। साल 1990 से ही सिर्फ 80 न्यायाधीशों की नियुक्तियां होती रही हैं। अधीनस्थ न्यायपालिका में पांच हजार रिक्तियां हैं जिसमें भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं है। यह ऐसा मामला है जिसपर सिर्फ न्यायपालिका को ही ध्यान देना है।’
