सर्पदंश के इलाज में इस्तेमाल हो रहे विष रोधी दवा (एंटी-स्रेक वेनम) का हर छठे मरीज पर दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है। यह खुलासा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के सहयोग से किए गए अध्ययन से हुआ है। अध्ययन में पाया गया कि देश में सर्पदंश के इलाज के बाद 17.2 फीसद मरीजों में विषरोधी दवा के दुष्प्रभाव मिले वहीं दम तोड़ देने वाले आधे मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाए।
इनमें करीब आधे पीड़ित गरीबी रेखा से नीचे वालों की मिली। सर्पदंश की समस्या पीड़ितों के जेब पर औसतन 6500 रुपए का बोझ डाल रही है। इन 17.2 फीसद मरीजों में से 6.3 फीसद प्रभावित लोगों में दवा देना बंद करना पड़ा। इन दवा के कारण लंबे समय तक चलने वाले असर अलग-अलग थे। इसमें न्यूरोलाजिकल दिक्कतें सबसे आम थी। इसका आंकड़ा करीब 2.3 फीसद रहा।
इसके अलावा 1.1 फीसद में काटने की जगह पर त्वचा पर घाव थे। दूसरी दिक्कतों में मनोवैज्ञानिक असर, स्थानीय रिएक्शन, किडनी और दिल की दिक्कतें, और कुछ दुर्लभ मामलों में अंग का कटना या दिव्यांगता भी शामिल थी। दरअसल, देश में सांप का काटना मृत्यु के लिए एक बड़ा कारण माना जाता है। लेकिन इसे लेकर रणनीति बनाने के लिए विश्वसनीय आंकड़े सीमित हैं। इस समस्या का हल निकालने के लिए आइसीएमआर के सहयोग से देश के 11 राज्यों के 25 जिलों में एक सर्वे किया गया। इस सर्वेक्षण में उक्त जिलों के 6 करोड़ आबादी को शामिल किया गया। इस समुदाय आधारित अध्ययन को फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने किया। जबकि अन्य दल ने सांप के काटने, सांप के प्रकार, मरीज को मिले इलाज और लागत के बारे में जानकारी इकट्ठा की।
जनसत्ता विशेष: सर्पदंश – जागरूकता व बेहतर इलाज से घटी दम तोड़ने वालों की संख्या
करीब एक साल तक चले इस सर्वेक्षण में 7094 सांप के काटने के मामले दर्ज किए गए। इसमें मृत्यु दर प्रति एक लाख आबादी पर 0.33 रही। इसमें चिंताजनक बात सामने आई कि करीब 43 फीसद मौतें अस्पताल पहुंचने से पहले या रास्ते में हो गईं। यह चिकित्सा सुविधा तक पहुंच की कमी को दिखाता है। अध्ययन में पाया गया कि सर्पदंश से पीड़ित 64.1 फीसद मरीज पुरुष थे।
सबसे अधिक प्रभावित 30 से 39 आयु वर्ग की रही। सर्पदंश की 62.1 फीसद घटनाएं मानसून के मौसम में दर्ज की गई। यह दुर्घटना खेती करते हुए या बाहरी काम के दौरान सबसे ज्यादा दर्ज हुई। हालांकि सर्पदंश के बाद 86.4 फीसद पीड़ितों ने अस्पताल में इलाज करवाया। इनमें से 60.2 फीसद मामलों में जहर रोधी दवा (एंटी-स्रेक वेनम) दी गई। इनमें से 17.2 फीसद मरीजों में जहर रोधी दवा से दुष्प्रभाव देखे गए।
अध्ययन में पाया गया कि सर्पदंश के बाद अस्पताल पहुंचे मरीज औसत 2.24 दिन भर्ती रहे। सर्पदंश की समस्या गरीबों पर भारी आर्थिक बोझ डाल रही है। अध्ययन में पता चला कि इसके कारण मरीज की जेब पर औसतन 6500 रुपए का बोझ पड़ा। इसमें पाया गया कि जो मरीज इजाज के लिए निजी अस्पताल में गए। उन्हें 27400 रुपए तक खर्च करने पड़े। वहीं सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने गए मरीजों को 3900 रुपए तक खर्च करना पड़ गया। अध्ययन में पता चला कि सर्पदंश से पीड़ित 47.5 फीसद परिवार गरीबी रेखा से नीचे वाले पाए गए। वहीं 87.7 फीसद पीड़ित लोगों के पास कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं था।
जैसलमेर में सबसे ज्यादा
अध्ययन में पाया गया कि राजस्थान के जैसलमेर जिले में सर्पदंश की दर सबसे अधिक पाई गई। जबकि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में इसके कारण मृत्यु दर सबसे अधिक रही। शोधकर्ताओं का कहना है कि मरीजों को जल्द व सुरक्षित अस्पताल पहुंचाने, बेहतर गुणवत्ता वाले जहर रोधी दवा उपलब्ध करवाने व स्वास्थ्य बीमा कवरेज बढ़ाने से इस समस्या को कम कर सकते हैं। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2030 तक सर्पदंश से होने वाले नुकसान को आधा करने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा।
