फिरोज गांधी कौन थे। ज्यादातर लोगों से यह सवाल पूछा जाए तो वह शायद इतना ही बता पाएंगे कि फिरोज इंदिरा गांधी के पति थे, राजीव और संजय गांधी के पिता और देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के दामाद थे लेकिन फिरोज गांधी का परिचय सिर्फ इन रिश्तों के जरिए नहीं कराया जा सकता। अपनी नई किताब “फिरोज द फॉर्गोटेन गांधी” में बर्टिल फलक ने फिरोज गांधी की जिंदगी के कई पहलुओं पर रोशनी डाली है। वहीं इस किताब की कांग्रेस सरकार में विदेश मंत्री रह चुके के. नटवर सिंह ने समीक्षा की है।
किताब की समीक्षा करते हुए सिंह लिखते हैं कि फिरोज एक मध्य वर्गीय परिवार से आते थे जो इलाहाबाद में रहते थे और वह नेहरू परिवार से परिचित थे। इंदिरा गांधी से शादी करने के बाद उन्होंने अपने नाम में गांधी उपनाम जोड़ लिया था। फिरोज और इंदिरा गांधी का परिचय ब्रिटेन में अपनी पढाई के दौरान ही हुआ था। न ही इंदिरा और न ही फिरोज पढ़ाई में कुछ खास कर पाए और यह दोनों के भविष्य में एक बड़ी कमी बनी रही।
1935 से 1940 के बीच में दोनों के बीच प्यार हुआ। सिंह के मुताबिक किताब में लेखक ने बहुत ही कोमलता के साथ इंदिरा गांधी और फिरोज की शादी का जिक्र किया है। इंदिरा गांधी ने लिखा कि फिरोज उन्हें काफी समय से प्रपोज कर रहे थे और हमने शादी करने का फैसला पैरिस में लिया था। दोनों की शादी मार्च 1942 में इलाहाबाद में हुई और इस शादी से जवाहरलाल नेहरू खुश नहीं थे लेकिन इंदिरा गांधी अपने इरादे पर डटी हुई थीं।
सिंह के मुताबिक फलक ने किताब लिखने में काफी रिसर्च की है और इतिहास से कई किस्से उठाए हैं। किताब में 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का भी जिक्र है जिसमें इंदिरा और फिरोज दोनों जेल गए थे। इसके बाद फिरोज एक साल तक अंडरग्राउंड हो गए थे। 1948 में इंदिरा और फिरोज अपने दोनों बच्चों के साथ तीन मूर्ति भवन में रहने चले गए थे। तभी से ही दोनों की शादी में खटास आने लगी क्योंकि फिरोज गांधी को यह मंजूर नहीं था कि वह घर जमाई बन कर रहें।

इसके बाद फिरोज लोकसभा में सांसद चुने जाने के बाद सरकार द्वारा आवंटित किए गए घर में रहने चले गए। किताब में 16 दिसंबर 1957 को संसद में फिरोज गांधी द्वारा दिए गए भाषण का भी जिक्र है। सिंह के मुताबिक फिरोज ने संसद में एलआईसी के घोटाले पर अपना भाषण दिया था। उस घोटाले के मुताबिक एलआईसी ने कोलकाता के कारोबारी हरिदास मुंद्रा की कंपनी में पैसा लगाया था। इस घोटाले की वजह से जवाहरलाल नेहरू के करीबी माने जाने वाले वित्त मंत्री टीटी कृष्णाम्चारी को इस्तीफा देना पड़ा और नेहरू इस बात से काफी खफा हुए थे।
फिरोज की मृत्यु सितंबर 1960 में दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई थी। फिरोज गांधी अपनी सेहत पर ध्यान नहीं देते थे और उन्हें दो बार पहले भी हार्ट अटैक आ चुका था। तीसरे हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु वेलिंग्टन अस्पताल (अब राम मनोहर लोहिया अस्पताल) में हुई थी। नटवर सिंह तब आर.के. नेहरू के सचिव थे और फिरोज गांधी की मृत्यु के बाद का दृश्य बताने की कोशिश करते हैं।
वीडियो: देखें इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी की शादी (Source: Youtube/Great Movies)
वह लिखते हैं कि जवाहरलाल नेहरू फिरोज की मृत्यु के बाद खुद को खोया हुआ सा महसूस करने लगे थे। जब फिरोज का शव तीन मूर्ति भवन ले जाया गया तो बड़ी तादाद में गरीब और मजदूर जनता उन्हें सम्मान देने के लिए तीन मूर्ति भवन पर इकट्ठा हुई थी। नटवर सिंह आगे लिखते हैं कि वह नेहरू के बारबर खड़े थे और नेहरू उनसे कहते हैं कि उन्हें अंदाजा नहीं था कि फिरोज जनता के बीच इतने लोकप्रिय हैं।

