इंदौर-पटना एक्सप्रेस रेल दुर्घटना में 146 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। यह दुर्घटना रेलवे के इतिहास में सबसे बड़े हादसों में याद की जाएगी लेकिन इस हादसे के तार भारतीय रेलवे की एक कमी से आसानी से जोड़े जा सकते हैं। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय रेलवे में सुरक्षा कर्मचारियों से जुड़े 1 लाख 27 हजार पद खाली पड़े हैं।
1 लाख से ज्यादा खली पड़े यह पद की सुरक्षा श्रेणी के कर्मचारियों में आते हैं। इनमें ट्रैक मन, पॉइन्ट मेन, पेट्रोल मन, टेक्नीशियन और स्टेशन मास्टर समेत कई ऐसे पद हैं जिनका संबंध सीधे रेलवे की सेफ्टी से जुड़ा होता है। दूसरी तरफ इन पदों पर लोगों की कमी की वजह से कई बार नियुक्त किए जा चुके कर्मचारियों को ज्यादा देर तक काम करना पड़ता है जो की काम की गुणवत्त के लिहाज से बुलकुल भी ठीक नहीं है।
2013 के आंकड़ों के मुताबिक रेलवे से जुड़े ऐसे ही 1 लाख 42 हजार पद खाली पड़े थे यानी की बीते तीन सालों में सिर्फ 19, 500 पदों पर नियुक्ति हुई है। इसके अलावा रेलवे मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक रेलवे के 2 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं और इनमें 50 फीसद से ज्यादा सीधे सुरक्षा संबंधित नौकरियों से जुड़े पद हैं जिन पर नियुक्ति होना अभी बाकी है।
रेलवे फेडरेशन के महासचिव शिवा गोपाल के मुताबिक जहां रेलवे को 3 पेट्रेल मेन की जरूरत है वहां पर बस 1 ही मौजूद है। इसके अलावा कई बार किसी ट्रैक मेन को 12-13 घंटे तक काम करना पड़ जाता है, ऐसा किसी के बीमार पड़ने या छुट्टी पर जाने की वजह से होता है। ऐसी स्थिति में सुरक्षा जांच की गुणवत्ता में फर्क आ सकता है और इसका नतीजा कई इंदौर-पटना एक्सप्रेस जैसी रेल दुर्घटनाएं के रूप में सामने आता है।
रेलवे अधिकारी चाहे जितना भी दावा क्यों न करें कि वह सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करते लेकिन इंदौर-पटना एक्सप्रेस की दुर्घटना गंभीर सवाल उठाती है।

