सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी ने हाल ही में अनुमान जताया है कि साल 2016-17 में देश में मांग से ज्यादा बिजली होगी। आंकड़े भी इस ओर इशारा कर रहे हैं। 2012-13 में जहां ‘पावर डेफिसिट’ यानी बिजली की कमी (मांग और आपूर्ति में अंतर) 8.7 फीसदी थी, वहीं 2015-16 में यह 2.1 फीसदी रही। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पहलू काफी स्याह है।
बिजली सप्लाई में कमी का आंकड़ा केवल मांग पर आधारित है। और मांग जहां बिजली कनेक्शन है, वहीं से आएगी। इस आंकड़े में जहां बिजली नहीं पहुंची है, उसका कोई जिक्र नहीं है। असलियत यह है कि देश के करीब एक-तिहाई (लगभग छह करोड़) ग्रामीण घरों में बिजली कनेक्शन ही नहीं है। ऐसे में बिजली की मांग का वास्तविक आंकड़ा काफी कम बैठता है और इसी आंकड़े के आधार पर पावर डेफिसिट का हिसाब लगाया जा रहा है। तो देश में मांग से ज्यादा बिजली उत्पादन की बात करना अभी बेमानी है। भारत में बिजली उपलब्धता की सही तस्वीर प्रति व्यक्ति बिजली की खपत के आंकड़ों से भी पाई जा सकती है। 2013-14 में भारत में प्रति व्यक्ति बिजली खपत 957 kWh थी, जबकि उसी साल विश्व स्तर पर यह आंकड़ा 3104 था।
आंकड़ों का छलावा
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के आंकड़ों के हिसाब से 2016-17 में ओड़ीशा, मिजोरम और त्रिपुरा में मांग से ज्यादा बिजली हो जाएगी। पर मई 2016 के आंकड़ों के हिसाब से इन राज्यों में 22 से 52 फीसदी तक गांव ऐसे हैं जहां बिजली पहुंची ही नहीं है। देश में बिजली उपलब्धता की सही तस्वीर इन आंकड़ों से भी आंकी जा सकती है:
देश में बिना बिजली कनेक्शन वाले घरों की प्रतिशतता-
राज्य ग्रामीण शहरी
बिहार 87 33
उ. प्र. 71 19
असम 66 16
झारखंड 63 12
उड़ीसा 52 17
मेघालय 46 5
मणिपुर 45 18
म.प्र. 43 7
तस्वीर का स्याह पहलू जानने के लिए इस चार्ट पर भी नजर डालिए

बिजली सप्लाई की हालत ये है:


