बीते कुछ सालों में देश के कई राज्यों में ‘महिलाओं के सम्मान’ के नाम पर कई आर्थिक सहायता योजनाएं की शुरुआत की गई है। पहले यह मॉडल कुछ राज्यों तक सीमित था, लेकिन अब यह भारत की नई “विमन-सेंट्रिक पॉलिटिकल इकॉनॉमी” का हिस्सा बन चुका है। कई राज्यों ने इसे ‘महिला सम्मान योजना’, ‘लक्ष्मी’, ‘लाड़ली बहना’, ‘मईया सम्मान’ या ‘मगरलिर उरिमाई’ जैसे नामों से लागू किया है। इनमें से ज्यादातर योजनाएं ₹1,000 से ₹2,500 हर महीने की नकद सहायता देती हैं।

इन योजनाओं का क्या प्रभाव?

  1. महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ रही है
  2. घरेलू फैसले लेने में उनकी भूमिका मजबूत हुई है
  3. चुनावों में उनका राजनीतिक झुकाव स्पष्ट रूप से बदल रहा है।

किस राज्य में कौनसी योजना?

राज्यवार महिला सहायता योजनाएं: पूरी तुलना

1हरियाणा₹2,100दीन दयाल लाड़ो लक्ष्मी योजनामासिक
2मध्य प्रदेश₹1,250-₹1,500मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजनामासिक
3कर्नाटक₹2,000गृह लक्ष्मी योजनामासिक
4महाराष्ट्र₹1,500मुख्यमंत्री माझी लड़की बहिन योजनामासिक
5बंगाल₹1,000-₹1,200लक्ष्मी भंडार योजनामासिक
6तमिलनाडु₹1,000कलाईनार मगरलिर उरिमाई थिट्टममासिक
7झारखंड₹1,000मुख्यमंत्री मइया सम्मान योजनामासिक
8ओडिशा₹10,000 (2 किश्त)सुभद्रा योजनावार्षिक
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इन योजनाओं का चुनाव पर असर कैसे पड़ता है?

महिला वोट बैंक का तेजी से उभरना: भारत में महिला मतदाताओं की संख्या और भागीदारी दोनों बढ़ रहे हैं। MP, बंगाल, कर्नाटक और महाराष्ट्र ने दिखाया है कि महिलाओं के लिए सीधे नकद सहायता वाली योजनाएँ वोटिंग पैटर्न बदल सकती हैं।

‘सरकार-खाता-महिला’ का सीधा रिश्ता: DBT सीधे खाते में आता है, इससे beneficiaries को हर महीने सरकार की याद रहती है। इससे भावनात्मक और व्यावहारिक दोनों जुड़ाव बनता है।

चुनाव में निर्णायक भूमिका: कई राज्यों में महिला वोट प्रतिशत पुरुषों से अधिक हो चुका है। पिछले मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा चुनाव में इसका असर देखने को मिला है।

राजनीतिक प्रतिस्पर्धा: अब चुनावों से पहले हर राज्य किसी न किसी रूप में ‘महिला सम्मान पैकेज’ घोषित करता दिखता है। यह 2026-2027 तक के चुनावों में भी मुख्य मुद्दों में रहेगा।

सामाजिक असर भी महत्वपूर्ण: इन योजनाओं से परिवार में महिलाओं की भूमिका मजबूत हुई है। खर्च का नियंत्रण बढ़ा है। इसके साथ ही डिजिटल बैंकिंग अपनाने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है।

महिलाओं के कल्याण के बहाने खुद का फायदा तलाश रहे सियासी दल

महिला-केंद्रित आर्थिक योजनाएं अब सिर्फ सामाजिक कल्याण का जरिया ही नहीं रहीं बल्कि भारत की चुनावी राजनीति में सियासी दलों का सबसे प्रभावी टूल बन चुकी हैं। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग सरकारों द्वारा अलग-अलग नाम से चलाई जा रही ये योजनाएं महिलाओं को आर्थिक शक्ति तो देती ही हैं लेकिन ये योजनाएं सियासी दलों को सीधे तौर पर सत्ता में रहने में मदद भी कर रही हैं।

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