UP Sexual and Reproductive Health: पॉपुलेशन कॉउंसिल संस्था के एक अध्ययन के मुताबिक किशोरावस्था में ब्याह दिए जाने का किशोरियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। विवाहित किशोरियों में परिवार नियोजन के विभिन्न आयामों से सम्बंधित जानकारी की कमी भी दर्ज की गई है। इसके अलावा कम उम्र में गर्भधारण और उसके फलस्वरूप न सिर्फ़ गर्भपात और शिशु मृत्यु के मामले बल्कि गर्भनिरोधक संबंधी जागरूकता और इस्तेमाल में भी किशोरियां काफी पीछे हैं। पॉपुलेशन कॉउंसिल संस्था के “उदया” अध्ययन में ये तमाम बातें सामने आई हैं। इस सर्वे में उत्तर प्रदेश के लगभग दस हज़ार किशोर एवं किशोरियों का 2015-16 और 2018-19 में दो चरण में सर्वेक्षण किया गया।
गर्भपात के बढ़ रहे मामले – सर्वे में शामिल चार में से एक विवाहित किशोरी गर्भपात का शिकार होती हैं। 18-22 की उम्र की विवाहित किशोरियों में से लगभग आधी अपनी पहली गर्भावस्था को टालना चाहती थीं, लेकिन गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल नहीं कर सकीं। वहीं 75% विवाहित किशोरियां (18-22 साल) ऐसी भी थी जिन्होंने कभी भी किसी भी तरह का कोई आधुनिक गर्भनिरोधक का इस्तेमाल नहीं किया।
उदया सर्वे के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में पिछले तीन वर्षों में 15 से 19 वर्ष की विवाहित किशोरियों में तात्कालिक गर्भनिरोध (कंडोम, गर्भनिरोधक गोलियां, कॉपर टी, सुई आदि) की मांग में कमी आई है। वर्ष 2015-16 में जहां 39 फीसदी किशोरियां तात्कालिक गर्भनिरोधक तरीके चाहती थीं, वहीं वर्ष 2018-19 में इसमें दस फीसदी (29 फीसदी) की गिरावट दर्ज की गई है।
दूसरी तरफ, 22 साल से कम उम्र की विवाहित किशोरियों में महिला नसबंदी की मांग में वृद्धि दर्ज की गई है। 2015-16 से 2018-19 तक इसी उम्र श्रेणी में नसबंदी की मांग 5 फीसदी से बढ़कर 17 फीसदी हो गई है। गौरतलब है कि 22 वर्ष से पहले ही विवाहित किशोरियों में ज्यादातर के तीन या तीन से अधिक बच्चे हो चुके हैं।
परिवार नियोजन में शिक्षा की अहमियत – “उदया” अध्ययन के आंकड़ें किशोरियों के स्वास्थ्य में शिक्षा की अहमियत को उजागर करते हैं। कम उम्र में किशोरियों का विवाह उनकी पढ़ाई पूरी नहीं होने देती है। उनमें परिवार नियोजन के तात्कालिक तरीकों की जानकारी की कमी है।
केंद्र सरकार ने किशोर और किशोरियों को उनके स्वास्थ्य के विभिन्न आयामों के प्रति सचेत और सहयोग करने के मकसद से वर्ष 2014 में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत की थी। उदया सर्वे में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के जागरूकता के आंकड़ें भी बहुत उत्साहवर्धक नहीं हैं, । इसके अलावा, आशा दीदी भी किशोरियों तक तभी पहुँचती हैं जब वे मां बन जाती हैं।
“उदया” अध्ययन के मुताबिक, शिक्षित किशोरियां ही सही फैसले ले पाती हैं । किशोरियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए सामाजिक और सांस्थानिक प्रयास किए जाने की जरूरत है। सामाजिक स्तर पर महत्वपूर्ण है कि लड़कियों को अपनी इच्छा अनुसार शिक्षा पूरा करने दिया जाए और किशोरावस्था में शादी न कराई जाए।
