पी वी संधु, साक्षी मलिक, दीपा कर्माकर और ललिता बाबर देश के अलग अलग हिस्सों से आती हैं और उनके संघर्ष की कहानी एक दूसरे से अलग है लेकिन उनमें एक बात समान है और वह यह है कि अपने साहस और शानदार खेल से उन्होंने ओलंपिक में देश के लचर अभियान में एक नयी जान डाल दी। इनमें से सभी को ओलंपिक पदक नहीं मिला, सिंधु का बैडमिंटन रजत और साक्षी का कुश्ती का कांस्य पदक जीतना खेलों में अब तक भारत के सबसे गौरवशाली क्षण रहें, लेकिन कोशिश और दृढ़ संकल्प की बात करें तो उसके प्रदर्शन में चारों महिलाएं बराबर थीं। चारों खिलाड़ियों की कहानी और अब तक का सफर एक दूसरे जुदा रहा है।

गोपीचंद को देख सिंधू बनीं शटलर क्वीन

स्पेन की विश्व नंबर एक कैरोलिना मारिन को कड़ी टक्कर देने के बाद ओलंपिक रजत पदक से संतोष करने वाली सिंधु भारत में खेलों का सबसे चमकीला सितारा बनकर उभरी हैं। सिंधु देश के दक्षिणी हिस्से से आती हैं। अर्जुन पुरस्कार विजेता वॉलीबॉल खिलाड़ी पी वी रमन्ना की बेटी सिंधु को खेलों की दुनिया में आने के लिए कहीं बाहर से प्रेरणा पाने की जरूरत नहीं थी। 21 साल की खिलाड़ी ने 2001 में पुलेला गोपीचंद को ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियन बनते देखा और इसके बाद उनसे प्रेरणा पाते हुए बैडमिंटन को अपनी मंजिल बना लिया। बाद में यहीं गोपीचंद उनके कोच बने और उन्हें ओलंपिक में भारत का सबसे बुलंद सितारा बना दिया। अब तक दूसरी बैडमिंटन खिलाड़ी पूर्व विश्व नंबर एक साइना नेहवाल के साए में रहीं सिंधु ने अब अपनी अलग पहचान बना ली है।

कंडक्टर की बेटी ने किया कुश्ती में कमाल

23 साल की साक्षी उत्तर भारत के हरियाणा से आती हैं, एक ऐसे राज्य से जहां कन्या भ्रूण हत्या की समस्या अब भी चिंता का विषय है। साक्षी ने अपने तीनों बाउट में पिछड़ने के बावजूद जिस तरह से अदम्य साहस का परिचय देते हुए कांस्य पदक जीता, वह प्रेरणा का स्रोत है। साक्षी रोहतक के जिस गांव से आती है वहां कभी उनके कुश्ती खेलने और इसके लिए उनके माता पिता के मंजूरी देने पर सवाल उठे थे लेकिन इस खिलाड़ी के कांस्य पदक जीतने पर वही गांव आज जश्न में डूबा हुआ है। साक्षी की इस सफलता के पीछे उनके बस कंडक्टर पिता और आंगनवाड़ी में काम करने वाली मां का बड़ा योगदान है जो हर कदम पर अपनी बेटी के साथ खड़े रहे।

दीपा ने दिलाई पहचान

पूर्वोत्तर भारत के त्रिपुरा की दीपा कर्माकर शर्मीले स्वभाव की, सीधी सरल और जिम्नास्टिक के खेल के लिए जुनूनी खिलाड़ी हैं। उन्होंने ओलंपिक में अपने शानदार प्रदर्शन से उस खेल को देश में एक नयी पहचान दी जिसमें अब तक कोई भी भारतीय खिलाड़ी ओलंपिक के लिए क्वालीफाई तक नहीं कर पाया था। रूस, अमेरिका, चीन और पूर्वी यूरोपीय देशों के दबदबे वाले खेल में दीपा को जानलेवा प्रोदुनोवा वॉल्ट करते देखना गौरवान्वित करने वाला क्षण था। दुनिया के दिग्गज खिलाड़ी तक प्रोदुनोवा करने से बचते हैं। दीपा के वॉल्ट में स्वर्ण पदक जीतने वाली अमेरिकी खिलाड़ी सिमोन बाइल्स ने भी फाइनल में प्रोदुनोवा वॉल्ट नहीं किया। दीपा भारत में इस खेल के लिए बुनियादी संरचना के अभाव के बावजूद अपने मध्यम वर्गीय परिवार के भावनात्मक समर्थन से लगातार अपना खेल बेहतर करती रहीं। उन्होंने 2014 के ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा और तब से एक के बाद एक नये कीर्तिमान बना रही हैं।

3000 मीटर के स्टीपलचेज में ललिता बाबर

भारत के लोग शायद ललिता बाबर को ज्यादा समय तक याद ना रखें क्योंकि 3000 मीटर के स्टीपलचेज के फाइनल में वह दसवें स्थान पर रहीं। लेकिन रियो के मराकाना स्टेडियम में छठे स्थान पर रहकर फाइनल के लिए क्वालीफाई कर जो उपलब्धि हासिल की वह सराहनीय है। महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक सूखा प्रभावित गांव से आने वाली लंबी दूरी की धाविका दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करने वाले बहुत सारे भारतीयों की जीजिविषा का प्रतीक हैं। ललिता ने ओलंपिक में राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया, वह भले ही दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के करीब नहीं थीं लेकिन निश्चित तौर पर उन्होंने उस खेल में अपनी ताकत दिखायी जिसमें मिल्खा सिंह और पीटी उषा के बाद से देश को कोई और महानायक नहीं मिला है।