प्रशासनिक अव्यवस्था में चार साल तक लटके रहने और ओलंपिक के निराशाजनक अभियान के बाद भारतीय मुक्केबाजी को वर्ष 2016 में नये महासंघ के रूप में उम्मीद की नयी किरण दिखी जबकि इस दौरान पेशेवर मुक्केबाजी ने भी भारत में अपने पांव पसारे। मुक्केबाजी में वर्ष 2016 का सबसे सकारात्मक पहलू चार साल तक चली रस्साकसी के बाद नये राष्ट्रीय महासंघ का गठन रहा। प्रशासकों के बीच आपसी खींचतान का असर मुक्केबाजों पर भी पड़ा और रियो ओलंपिक में लचर प्रदर्शन का सबसे बड़ा कारण भी इसे ही माना गया। इस दौरान भारत में पेशेवर मुक्केबाजी ने भी पांव पसारे और इस दौरान विजेंदर सिंह ने दिल्ली में अपने प्रशंसकों के सामने डब्ल्यूबीओ एशिया पैसेफिक सुपर मिडिलवेट के खिताब का सफलतापूर्वक बचाव भी किया। भारत में हालांकि पेशेवर मुक्केबाजी को लोकप्रियता हासिल करने में थोड़ा समय लगेगा क्योंकि यहां लोग अब भी क्रिकेट और ओलंपिक पदकों के दीवाने हैं। जब ओलंपिक पदकों की बात आती है तो भारतीय मुक्केबाजों ने निराश किया। रियो ओलंपिक में केवल तीन भारतीय पुरुष मुक्केबाज शिव थापा, मनोज कुमार और विकास कृष्ण ही जगह बना पाये जबकि इससे पहले 2012 के लंदन खेलों के लिये सात पुरुष और एक महिला मुक्केबाज ने क्वालीफाई किया था।
भारतीयों को कड़ा ड्रा मिला और उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में नहीं खेलने का भी खामियाजा भुगतना पड़ा। तीनों भारतीय पदक जीतने में नाकाम रहे। इससे पहले भारत के लिये 2008 में विजेंदर और 2012 में एम सी मेरीकोम ने मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीते थे। रियो का प्रदर्शन से सभी की आंख खुल गयी क्योंकि इससे पहले मुक्केबाजों के अच्छे प्रदर्शन से प्रशासकों की गलतियों पर किसी की नजर नहीं पड़ती थी। रियो से पहले मुक्केबाजों ने भी जिस भी टूर्नामेंट में हिस्सा लिया उसमें उन्होंने पदक जीता लेकिन बड़े मंच पर वे अच्छे परिणाम देने में असफल रहे। अगस्त में रियो की नाकामी का ही असर था कि कई बार टाले जाने के बाद आखिर में सितंबर में चुनाव कराये गये और नया महासंघ – भारतीय मुक्केबाजी महासंघ (बीएफआई) – का गठन हुआ। इसके अधिकतर पदाधिकारियों को सर्वसम्मति से चुना गया। नये महासंघ ने एक महीने के अंदर ही पुरुष और महिला दोनों वर्गों में राष्ट्रीय चैंपियनशिप का आयोजन कराया।
रिंग के अंदर की बात की जाए तो शिव थापा चीन में एशियाई क्षेत्र के ओलंपिक क्वालीफाईंग टूर्नामेंट के जरिये रियो खेलों में जगह बनाने वाले पहले मुक्केबाज बने थे। एल देवेंद्रो सिंह (52 किग्रा) और मेरीकोम (51 किग्रा) दोनों ने इस साल अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन वे ओलंपिक के लिये क्वॉलीफाई नहीं कर पाये। मेरीकोम के लिये राहत की बात यह रही कि उन्हें पांच विश्व चैंपियनशिप जीतने के लिये वर्ष के आखिर में अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ (आईबा) का लीजेंड अवॉर्ड मिला। उन्होंने इसके बाद ही आगे से 48 किग्रा में हिस्सा लेने का फैसला किया क्योंकि यह कयास लगाये जा रहे हैं उनका यह पसंदीदा भार वर्ग 2020 तोक्यो ओलंपिक में शामिल किया जा सकता है।
