ऑटिज्म एक ऐसा न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है जिसमें पीड़ित बचपन से ही दूसरे बच्चों की तरह अपने परिवार के सदस्यों या आसपास के माहौल के साथ जुड़ नहीं पाते हैं, यानी कि उन्हें दूसरों की बात समझने, अपनी बात समझाने या दूसरे की बात सुनकर उस पर प्रतिक्रिया देने में दिक्कत आती है। आज वर्ल्ड ऑटिज्म डे है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2007 में 2 अप्रैल के दिन को विश्व आटिज्म जागरूकता दिवस घोषित किया था। इस दिन उन बच्चों और बड़ों के जीवन में सुधार के कदम उठाए जाते हैं, जो आटिज्म से पीड़ित होते हैं और साथ ही उन्हें इस समस्या के साथ सार्थक जीवन बिताने में सहायता दी जाती है। नीला रंग आटिज्म का प्रतीक माना गया है। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में 2017 में तकरीबन 10 लाख लोग ऑटिज्म से पीड़ित थे। ऑटिज्म से पीड़ित लोगों को लेकर समाज में भी तमाम तरह की धारणाएं मौजूद हैं। ऐसे लोगों को लेकर लोगों के मन में कई तरह के मिथक हैं। ऐसे ही तीन मिथकों के बारे में आज हम आपको बताने वाले हैं।
1. ऑटिज्म पीड़ित असामाजिक होते हैं – अधिकांशतः ऑटिज्म से पीड़ित लोग अकेले रहना पसंद करते हैं लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि उन्हें दोस्तों या साथियों की जरूरत नहीं है। ऑटिज्म से पीड़ित लोग सामान्य लोगों की उनको लेकर प्रतिक्रियाओं को लेकर आशंकित रहते हैं। ऐसे लोग ऑफेंडिंग लोगों से भयभीत रहते हैं। इस वजह से वह थोड़े सशंकित दिखते हैं। ऐसे में उन्हें असामाजिक दिखना ठीक नहीं है।
2. ऑटिज्म से पीड़ित लोग मूर्ख होते हैं – ऑटिज्म बौद्धिक अक्षमता की बीमारी नहीं है। ऑटिज्म से पीड़ित एक व्यक्ति अपने विचारों को प्रस्तुत नहीं कर पाता तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इंटेलीजेंट नहीं हो सकता। कई ऑटिज्म पीड़ित ऐसे होते हैं जो दूसरों की तुलना में ज्यादा तेज होते हैं। गंभीर स्थिति वाले ऑटिज्म से पीड़ित लोगों में आईक्यू लेवल कम होता है लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो इस मामले में विलक्षण सिद्ध होते हैं।
3. ऑटिज्म से पीड़ित लोग प्यार अनुभव नहीं करते – ऑटिज्म से पीड़ित लोग आम लोगों की तुलना में स्पर्श और आवाज को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं। खासतौर पर उन लोगों से जो अपरिचित होते हैं। इसका यह कतई मतलब नहीं है कि उन्हें प्यार महसूस नहीं होता। सामान्य लोगों की तरह ऑटिज्म से पीड़ित लोग भी प्यार के भूखे होते हैं।
