देश में खतरनाक तरीके से बढ़ रहे स्ट्रोक यानी पक्षाघात के मामले में युवा वर्ग इसकी चपेट में आने लगे हैं। स्ट्रोक किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। देश में स्ट्रोक के लिए प्रभावी उपचार की व्यवस्था हो रही है, लेकिन स्ट्रोक के बाद पुनर्वास की अवधि (गोल्डेन पीरियड) अभी भी उपेक्षित क्षेत्र है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में हर साल 18 लाख से ज्यादा स्ट्रोक के मामले सामने आते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इनमें से लगभग 15 फीसद मामले 30 और 40 साल की उम्र या इसके ऊपर के लोगों को प्रभावित करते हैं। उनका कहना है कि इस तथ्य पर जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है कि स्ट्रोक पुनर्वास में पहले 90 दिनों को स्वर्ण अवधि भी कहा जाता है। यानी स्ट्रोक पीड़ित व्यक्ति का इलाज कर उसे 90 दिनों के भीतर यथासंभव उसकी सामान्य दिनचर्या लायक बनाना व उसे फिर से उसके कामकाज से जोड़ देने से ही बेहतर नतीजे मिलते हैं। वर्ना धीरे-धीरे दिमागी व शारीरिक नुकसान स्थाई रूप ले लेता है।
स्ट्रोक या सेरेब्रो वास्कुलर एक्सीडेंट (सीवीए) के परिणामस्वरूप मस्तिष्क में अचानक खून की कमी या मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव होता है, जिसके कारण शरीर की न्यूरोलॉजिकल क्रियाकलाप खराब होने लगता है। मोटापे, धूम्रपान, उच्च रक्तचाप, शराब, मधुमेह और पारिवारिक इतिहास आदि स्ट्रोक की प्रमुख वजह बनते हैं। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया डॉ केके अग्रवाल बताते हैं कि स्ट्रोक वाले किसी भी व्यक्ति को जल्द से जल्द अस्पताल ले जाया जाना चाहिए और तुरंत एक क्लॉट डिजॉल्विंग थेरेपी दी जानी चाहिए। बीमारी के बारे में कम जागरूकता के कारण इन्हें ठीक से नियंत्रित नहीं किया जाता। वरिष्ठ स्ट्रोक विशेषज्ञ डा विनीत सूरी कहते हैं कि स्ट्रोक दुनिया भर में प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं में से एक है। पिछले कुछ दशकों में भारत में इसका बोझ खतरनाक दर से बढ़ रहा है। संसाधनों की उस अनुपात में भारी कमी भी है।
स्ट्रोक के संकेतों को पहचाने
चेहरा टेढ़ा होना, बोलने में दिक्कत, पहचान में परेशानी और टाइम टु इमरजेंसी, जो कि दवा उपचार के लिए पहले 4.5 घंटे और ब्रेन वेसल इंटरवेंशन के लिए शुरुआती 24 घंटे हैं। यानी स्ट्रोक के साढे़ चार घंटे के भीतर दवा से इलाज शुरू हो जाना चाहिए। वर्ना स्ट्रोक के कारण होने वाली विकलांगता अस्थायी से स्थायी हो सकती है। स्ट्रोक के कुछ लक्षणों में चेहरे, हाथ या पैर (विशेष रूप से शरीर के एक तरफ)की अचानक कमजोरी, भ्रम, चलने में परेशानी, चक्कर आना, संतुलन बनाने में दिक्कत और गंभीर सिरदर्द आदि शामिल हैं।
विशेषज्ञों के कुछ सुझाव
90 फीसद स्ट्रोक 10 जोखिम कारकों से जुड़े होते हैं, जिन्हें बदला जा सकता है। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करें। हफ्ते में पांच बार हल्का व्यायाम करें। फल और सब्जियां खाएं, नमक कम लें। कोलेस्ट्रॉल कम करें। स्वस्थ बीएमआइ या कमर-से-कूल्हे का अनुपात बनाए रखें। धूम्रपान बंद करें और इसके धुएं से भी बचें। शराब का सेवन कम करें। मधुमेह से होने वाले जोखिम को डॉक्टर से बात करके कंट्रोल करें। स्ट्रोक की जानकारी करें।
