बॉलीवुड में किसी का रुख साफ नहीं रहता। एक फिल्म फ्लॉप होती है तो अभिनेताओं का स्टैंड बदल जाता है। जो महिला कलाकार पुरुष कलाकारों के बराबर मानदेय की मांग मुखर होकर करती हैं। मगर अगले ही दिन पता चलता है कि वे किसी एेसे एक्टर के साथ काम कर रही हैं, जो औरतों के प्रति नफरत रखता है। लेकिन उनके पास विकल्प ही क्या है, इस इडस्ट्री में टिकना है तो ‘कॉम्प्रोमाइज’ तो करना ही पड़ेगा। अगर सामने कोई ‘सुपरस्टार’ हो, फिर तो विरोध की जरा भी गुंजाइश नहीं रह जाती। सोमवार को बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को राजस्थान हाई कोर्ट ने 1998 के चिंकारा शिकार मामले में बरी कर दिया। फैसला आते ही जिस तरह सोशल मीडिया पर बधाइयों की बाढ़ आई, उससे साफ था कि लोग ख्ुाश हैं, उन्हें इस बात की परवाह नहीं कि दो दुर्लभ जानवरों का कातिल अभी तक नहीं मिला।
एक साल पीछे चलते हैं। पिछले साल जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2002 हिट एंड रन केस में सलमान को 5 साल की सजा सुनाई थी तो पूरा बॉलीवुड जैसे सदमें में आ गया था। हर शख्स नाराज नजर आ रहा था। मामला यह था कि सलमान की कार फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर चढ़ गई थी, जिसमें एक की मौत और चार लोग घायल हो गए थे। तब तो बॉलीवुड से यही आवाज आई थी सलमान को सेलिब्रिटी होने की कीमत चुकानी पड़ी है। लेकिन इन्हीं लोगों को सलमान की रेप वाली टिप्पणी बिलकुल आपत्तिजनक नहीं लगी। कुछ लोगों ने मुंह खोला था जरूर, मगर ज्यादातर ने इस पर चुप्पी ही साधे रखी। शायद आलोचना करने के लिए बॉलीवुड अपनी सुविधा के हिसाब से मुद्दे चुनता है, जो कि कोई नई बात नहीं है। 1980 में वर्कर्स यूनियन की हड़ताल से लेकर उड़ता पंजाब तक, मुखर होने के लिए मुद्दों के चयन में बॉलीवुड का रवैया पक्षपात से भरा रहा है। बॉलीवुड खुद को राजनीतिक छींटाकशी से दूर रखता है।
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बॉलीवुड में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है, जो खुद को ‘इंटरनेशनल कैलिबर’ का फिल्ममेकर बताते हैं, मगर असल में उनकी फिल्मों में फूहड़ता और घटिया कहानी के सिवा कुछ नहीं होता। यह तथाकथित ‘सेलिब्रिटी’ तब शब्दों को लेकर सिलेक्टिव हो जाते हैं, जब अर्जित सिंह जैसा गायक सोशल मीडिया पर माफी मांगता नजर आता है। बलात्कार पर घटिया टिप्पणी के खिलाफ जब सोना महापात्रा अपनी राय रखती है, तो अंधभक्त उन पर ऐसे टूट पड़ते हैं मानों न जाने उनसे ऐसा क्या अपराध हो गया हो। उन्हें गालियां दी जाती हैं, कई घटिया विशेषणों से नवाजा जाता है, लेकिन तब बॉलीवुड का कोई बड़ा नाम उनके समर्थन में सामने नहीं आता।
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जब एक दिग्गज अभिनेता का बेटा, जिसपर अपनी ही गर्लफ्रेंड को आत्महत्या के लिए उकसाने और मजबूर करने का आरोप हो, अपनी पहली फिल्म के साथ बड़े पर्दे पर उतरता है, तो इसी बॉलीवुड के बड़े नाम उसे सफलता का दूसरा नाम तक बता जाते हैं। किसी के मन में एक बार भी उस पर लगे आरोपों पर गौर करने का ख्याल नहीं आता, जबकि वे सभी इस सुनहरी दुनिया के पीछे की काली सच्चाई को जानते हैं। एक औसत दर्जे की फिल्म में बेहद साधारण अभिनय के बावजूद उस अभिनेता को बेस्ट डेब्यू (न्यूकमर) आर्टिस्ट के खिताब से नवाज दिया जाता है। ऐसा होना भी लाजिमी है, क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री एक परिवार है और घर की बातें घर में ही रहें, तो ज्यादा अच्छा है।
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वे लोग जो बाकी मुद्दों पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखते हैं, खान की बात आते ही चुप्पी साध लेते हैं। सलमान की आलोचना करना तो दूर, वे उनके बयान की निंंदा तक नहीं करते। सलमान खान आज बॉलीवुड के सबसे बड़े सितारों में से एक हैं, कोई भला उनसे पंगा क्यों लेना चाहेगा? क्यों कोई चाहेगा कि उसका हाल विवेक ओबेराय या अर्जित सिंह जैसा हो। बॉलीवुड का यह पाखंड ऐसे ही जारी रहेगा क्योंकि वे ऐसे ही बने रहना चाहते हैं। लेकिन कम से कम उन्हें झूठ की आड़ में अपनी कायरता को छिपाना बंद कर देना चाहिए।

