Ramayan 5 April Episode: सुग्रीव राम-लक्ष्मण की असलियत जानने के लिए मंत्री हनुमान को उनके पास भेजते हैं। हनुमान को देखते ही राम अपने सबसे बड़े भक्त को पहचान जाते हैं। हालांकि वह जाहिर नहीं होने देते हैं। हनुमान उनको अपना परिचय बताते हुए कहते हैं कि वह सुग्रीव के कुल पुरोहित केसरी नंदन हैं। हनुमान सारे भेद जानने के लिए कई प्रश्न करने लगते हैं जिसपर लक्ष्मण काफी गुस्सा हो जाते हैं।
हनुमान पूछते हैं कि किस कारण से यहां आए हैं और यहां का पता किसने दिया? राम हनुमान को बताते हैं कि माता सबरी ने सुग्रीव का पता दिया है। वह हमारी मदद कर सकते हैं। हनुमान राम से अपना असली परिचय बताने को कहते हैं। वे कहते हैं कि अगर वे अपना असली परिचय बताते हैं तो वे राजा सुग्रीव से मिलवा सकते हैं। हनुमान की बातें सुन लक्ष्मण परिचय देते हुए कहते हैं कि वह परम प्रतापी अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं। राम नाम सुनते ही हनुमान की आश्चर्य होते हैं और तुरंत राम के पैरों में गिर पड़ते हैं। राम हनुमान को उठाते हैं और गले लगा लेते हैं। राम कहते हैं- तुम तो मेरे लक्ष्मण और भरत के समान ही प्रिय हो। इसके बाद वह राम और लक्ष्मण को कंधे पर बैठा सुग्रीव के पास ले जाते हैं।
4 अप्रैल के शाम वाले एपिसोड में दिखाया गया कि राम और लक्षमण से अपनी बेइज्जती और अपने भाई खर-दूषण की मौत के बाद शूर्पनखा लंका नरेश रावण के पास जाती है। रावण के समक्ष वो सीता की बहुत तारीफ करती है और कहती है कि “ब्रम्हांड के सभी रत्न तो आपके पास ही हैं, सीता भी स्त्रियों में रत्न की भांति है। बदले की आग में जल रही शूर्पनखा आगे कहती है कि- जब मैं उसे आपके लिए मांगने गई तो ये दुष्ट राम और लक्षमण ने मेरे साथ बद्तमीजी की और लक्षमण ने क्रोध में आकर मेरा नाक काट दिया। मैंने उन दोनों से कहा कि मैं लंकाधिपति रावण की बहन हूं, इस पर उन दोनों ने आपको ललकारते हुए कहा कि हम किसी से नहीं डरते। आप कृपया जाएं और बलपूर्वक या फिर कपट से सीता को उठा ले आएं क्योंकि राम की जान तो अपनी सीता में ही बसती है।
अपनी बहन की ये दयनीय हालत से क्रोधित रावण अपने भाई विभीषण और पत्नी मंडोदरी के मना करने के बावजूद छल से सीता को उठाने का निर्णय कर मारीच के पास पहुंचता है। रावण मारीच से अनुरोध करता है कि वो अपनी माया से एक सुंदर हिरण का रूप ले और सीता के सामने जाए। सीता जब उसे देखेगी तो अवश्य ही आकर्षित होगी और राम से उसे पाने की हठ करेगी। जैसे ही राम उन्हें अकेला छोड़ कर जाएंगे, रावण भेष बदलकर सीता को अगवा कर लेगा। शुरू में तो मारीच नहीं माना और रावण को भी अपनी जिद छोड़ने का सुझाव दिया। लेकिन अंत में, उन्होंने राम जी के बाणों से छलनी होकर स्वर्ग सिधारने का निर्णय किया। मृग तृष्णा में चूर सीता ने वही किया जैसा रावण ने सोचा था। लक्षमण द्वारा बनाए गए लक्षमण रेखा को जैसे ही सीता ने पार किया, दुष्ट रावण सीता को उठाकर लंका की ओर चल पड़ा। आइए जानते हैं क्या खास होगा आज के एपिसोड में-


राम और हनुमान का मिलन काफी रोचक प्रसंग बन पड़ता है। हनुमान पंडित का रूप धारण कर राम का भेद जानने की कोशिश करते हैं। हनुमान पूछते हैं कि किस कारण से यहां आए हैं और यहां का पता किसने दिया। राम हनुमान को बताते हैं कि माता सबरी ने सुग्रीव का पता दिया है। वह हमारी मदद कर सकते हैं। हनुमान कहते हैं कि अपना असली परिचय दीजिए फिर हम सुग्रीव से मिलाव देंगे। इसके बाद लक्ष्मण बताते हैं कि वह परम प्रतापी अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं। राम नाम सुनते ही हनुमान की आश्चर्य होते हैं और तुरंत राम के पैरों में गिर पड़ते हैं। राम हनुमान को उठाते हैं और गले लगा लेते हैं। राम कहते हैं- तुम तो मेरे लक्ष्मण और भरत के समान ही प्रिय हो।
सुग्रीव राम-लक्ष्मण की असलियत जानने के लिए मंत्री हनुमान को उनके पास भेजते हैं। हनुमान को देखते ही राम अपने सबसे बड़े भक्त को पहचान जाते हैं। हालांकि वह जाहिर नहीं होने देते हैं। हनुमान उनको अपना परिचय बताते हुए कहते हैं कि वह सुग्रीव के कुल पुरोहित केसरी नंदन हैं। हनुमान सारे भेद जानने के लिए कई प्रश्न करने लगते हैं जिसपर लक्ष्मण काफी गुस्सा हो जाते हैं।
जानकी को ढूंढते-ढूंढते राम और लक्ष्मण ऋषिमुख पर्वत पहुंच गए हैं। राम-लक्ष्मण की मौजूदगी की सूचना गुप्तचर सुग्रीव को देता है। इस सूचना के मिलने के बाद सुग्रीव काफी परेशान हो जाते हैं कि कहीं ये बाली के भेजे कोई गुप्तचर तो नहीं।
सीता को ढूंढते-ढूंढते राम और लक्ष्मण काफी भावुक हो जाते हैं। राम छोटे भाई लक्ष्मण से कहते हैं कि जानकी की बहुत याद सता रही है। वह हमारे भरोसे जीवित होगी कि हम उसे ढूंढ लेंगे।
इसी एपिसोड के साथ रामायण का हरण्य कांड समाप्त हुआ। महर्षि अगस्त्य मुनि राम के आखिरी गुरू बने क्योंकि इसके उपरांत श्री राम को केवल शबरी, हनुमान, सुग्रीव जैसे भक्त मिले। ये कांड परम शिक्षाप्रद और भक्ति-भाव से ओत-प्रोत है।
गुरु मतंग ने शबरी के जरिये राम को संदेश दिया कि वो आनंदपूर्वक सीता के साथ अयोध्या लौटेंगे। इसके उपरांत शबरी ने राम जी को सुग्रीव तक पहुंचने का रास्ता बताया और राम के परम भक्त हनुमान के बारे में भी जानकारी दी। इसके साथ ही शबरी ने राम जी से कहा कि उनके हाथों ही सुग्रीव का एक महत्वपूर्ण कार्य संपन्न होगा। राम ने शबरी से प्रार्थना की कि अगर संभव हो तो उन्हें गुरु मतंग जहां ध्यान करते हैं उस जगह ले चलें। वहां पहुंचने के बाद शबरी ने राम से भक्ति का ज्ञान मांगा। इसके बाद राम ने अपने गुरुओं से प्राप्त ज्ञान शबरी को कह सुनाया। शबरी ने राम को दीन दयाल कहते हुए अपने कुटिया के पास जाने की आज्ञा मांगी।
गुरु मतंग ने शबरी से कहा था कि राम तुम्हें अवश्य दर्शन देंगे। राम की आस देखते हुए शबरी रास्ते में फूल बिछाते जा रही हैं। फलों को चखकर राम के लिए थाली सजा रही हैं। दूसरे मुनियों को फूलों पर न चढ़ने की विनती कर रही हैं। राम को अपने समक्ष देखकर शबरी का मन प्रसन्नता से भर गया और उनके चक्षुओं से अश्रुधारा बहने लगे। राम को अपनी कुटिया में ले जाते हुए शबरी फूलों की वर्षा कर रही थीं। जैसे ही शबरी ने उनके पैर धोने चाहे तो राम ने ये कहते हुए मना कर दिया कि उनके आंसुओं से ही उनके पैर धुल गए। इसके उपरांत, प्रभु श्री राम ने शबरी के जूठ मीठे फल खाए जिसे देखकर लक्षमण भी चकित रह गए। राम ने शबरी से कहा कि बहुत सालों बाद ऐसा लगा मानो मां कौशल्या उन्हें खिला रही हों। शबरी ने राम को बताया कि गुरु मतंग के इस वन में सभी जीव हिंसा का रास्ता छोड़ देते हैं।
राक्षस कमन के कहे अनुसार दाह संस्कार के बाद वो गंधर्व रूप में उपस्थित हुए। अपने दिव्य ज्ञान के अनुसार उन्होंने बताया कि सीता जी की खोज करने में विशाल वानर सेना के राजा सुग्रीव उनकी मदद करेंगे। अपनी दिव्य ज्ञान से उन्होंने बताया कि अंत में विजय राम की ही होगी। इसके अलावा, गंधर्व ने राम और लक्षमण को शबरी के बारे में भी बताया कि कैसे वो रात दिन राम को भगवान मानकर उनकी पूजा करती हैं।
राम और लक्षमण सीता को खोजते हुए दक्षिण दिशा में जा रहे थें और वहां अन्हें सीता की चूड़ियां मिली जिससे उन्हें पता चला कि वो सही दिशा में जा रहे हैं। आगे बढ़ने के साथ ही उनका सामना हुआ कमन राक्षस से, लक्षमण ने तुरंत ही उनकी बांहें काट दीं। जैसे ही राम-लक्षमण उसके पास पहुंचे तो राक्षस ने कहा कि तुम दोनों वीर कहीं राम और लक्षमण तो नहीं हो। इस पर लक्षमण ने पूछा कि तुम तो राक्षस हो तो हमें कैसे जानते हो इस पर राक्षस ने बताया कि ऋषि स्थूलशिरा के श्राप के अनुसार बस श्री राम और लक्षमण जब अनको अग्नि में डालेंगे तभी वो अपने गंधर्व रूप में वापस आ पाएंगे और रावण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दे पाएंगे। अपने श्राप के बारे में बताया कि ऋषि ने उन्हें श्राप देते हुए कहा कि सुंदर शरीर होने के बावजूद अब तुम्हारा शरीर राक्षस के भांति हो जाएगा।
मंडोदरी ने रावण से गुजारिश करते हुए कहा कि कृप्या कर वो सीता को राम के पास वापस छोड़ आएं, इसी में सबकी भलाई है। लेकिन अपने अहंकार में चूर रावण ने कहा कि वीर पुरुष एक बार जब किसी कार्य की तरफ कदम बढ़ा देते हैं तो पीछे नहीं हटते। मंडोदरी को फटकार लगाते हुए उन्होंने कहा कि रावण की पत्नी और मेघनाथ की माता को ऐसी कायरता शोभा नहीं देती।
रानी मंडोदरी ने अपनी सेविका से कहा कि सीता को विशेष अतिथि का सम्मान देते हुए उनकी ओर से नए वस्त्र भेंट करें। उन्होंने सीता से कहलवाया कि अगर उन्हें किसी भी चीज की जरूरत हो तो उन्हें जरूर बताएं। सीता ने सेविका से भेंट वापस करते हुए कहा कि मंडोदरी का वो अनिष्ट नहीं चाहती हैं इसलिए रावण को समझा-बुझाकर उन्हें राम के पास छोड़ आएं। ऐसा नहीं करने पर अंजाम बहुत विनाशकारी होगा।
राक्षसी विजेता ने सीता को ढांढस बंधाया और कहा कि वो नीतिवान विभीषण के पास से उनके लिए सात्विक भोजन का प्रबंध करेंगी। राक्षसी ने सीता को पुत्री कहते हुए कहा कि उनकी कोई संतान नहीं है और सीता जैसी पुत्री को पाकर वो धन्य हो गई। मां जानकी ने भी विजेता को मां कहकर बुलाया।
रावण को भगवान नील कुबेर ने श्राप दिया था कि अगर उसने किसी भी स्त्री को बलपूर्वक हासिल करने की कोशिश की तो रावण के सिर के 7 टुकड़े हो जाएंगे। इसी वजह से रावण चाहता था कि सीता स्वयं ही अपनी प्रसन्नता से उनके पास चली जाए। अशोक वाटिका में मौजूद राक्षसनियां सीता को डरा-धमका कर समझाने की कोशिश करने लगीं। तभी राक्षसी विजेता वहां पहुंची और पतिव्रता सीता से प्रभावित होकर उनसे भोजन करने का अनुरोध करने लगीं। राक्षसी ने मां सीता से कहा कि अपने लिए न सही तो अपने पति राम के लिए उन्हें जीवित रहना होगा।
रावण अशोक वाटिका में पहुंचकर सीता के सामने अपनी शक्ति का बखान करने लगा। इस पर सीता ने क्रोधित होकर कहा कि आज तक तुमने केवल देवताओं को हराया है लेकिन इस बार तुम्हारा सामना एक पतिव्रता नारी से हुआ है। वैभव, शक्ति और संपत्ति का मोह दिखाकर रावण ने सीता को अपनी स्वामिनी बनने के लिए कहा जिस पर सीता कहने लगीं कि राम सिंह की भांति तेज और पराक्रमी हैं। जैसे ही रावण ने सीता पर बल का प्रयोग करना चाहा तो सीता ने घास का एक तिनका लेकर कहा कि अगर तुमने इसे पार किया तो तुम भस्म हो जाओगे।
सीता की खोज में वन में भटक रहे राम की नजर घायल अवस्था में पड़े जटायू पर पड़ी। जटायू ने राम को बताया कि रावण सीता को दक्षिण दिशा में लेकर गया है। राम ने जटायू से गुजारिश की अगर वो परलोक में राजा दशरथ से मिलें तो उन्हें सीता के अगवा होने का ये वृतांत न बताएं। साथ ही, राम ने उनसे वादा किया कि वो रावण से उनकी इस स्थिति का बदला लेंगे। बुजुर्ग जटायु के जब प्राण पखेरू हो गए तब राम ने पूरे विधि विधान से उनका दाह संस्कार किया।
एपिसोड की शुरुआत में राम और लक्षमण सीता की खोज में वन में अलग-अलग जगह भटक रहे हैं। विरह की आशंका राम जी के चेहरे पर साफ झलक रही है। पेड़-पौधों के आगे हाथ जोड़कर श्री राम सीता का पता पूछ रहे हैं।
मां जानकी की इच्छा का पालन करते हुए श्री राम उस सुनहरे हिरण के पीछे चल पड़ें। हिरण का रूप धारण किए हुए मारीच को रावण ने कहा था कि राम को जितना हो सके उतनी दूर ले जाए। काफी दौड़-भाग के बाद जब राम ने मृग पर अपने बाणों से निशाना साधा तो घायल अवस्था में मारीच सीता और लक्षमण का नाम लेने लगे ताकि उन्हें लगे कि श्री राम किसी परेशानी में हैं।
विभीषण के अनुसार छल और कपट का प्रयोग कर एक पर स्त्री को अगवा करने का विचार एक राजा को शोभा को नहीं देता। विभीषण श्री राम के पराक्रम से परिचित थें और वो नहीं चाहते थे कि अहंकार में चूर रावण का विनाश हो जाए। विभीषण और रावण की पत्नी ने उनको रोकने की पूरी कोशिश की लेकिन शूर्पनखा के अपमान का बदला और सीता को हासिल करने की जिद के चलते रावण अपने फैसले पर अडिग रहा।