सरकार ने बुधवार को कहा कि ऋणशोधन व दिवाला संहिता (आईबीसी)-2016 बनाए जाने से बैंकों के फंसे हुए नौ लाख करोड़ रुपये के कर्ज के आधे से कम की रकम प्रणाली में वापस आ चुकी है। उद्योग संगठन सीआईआई की ओर से करवाए गए एक सम्मेलन में कंपनी मामलों के मंत्रालय में सचिव इंजेती श्रीनिवास ने यह जानकारी दी। इससे एक दिन पहले उनकी अध्यक्षता में ऋणशोधन विधि समिति (आईएलसी) की रिपोर्ट जारी हुई है। श्रीनिवास ने बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आईबीसी के तहत समाधान के लिए पिछले साल जून में 12 खातों का जिक्र किया था, जिनमें कुल फंसे हुए कर्ज (एनपीए) की 25 फीसदी थी। उन्होंने आगे कहा कि इन मामलों में अच्छे परिणाम आए हैं, जिससे व्यवस्था में विश्वास बढ़ाने में मदद मिलेगी। अंतिम निर्णायक राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) इस व्यवस्था का एक प्रमुख घटक है। उन्होंने कहा, “अगर पांच-छह अच्छे नतीजे मिल रहे हैं तो इससे घरेलू और विदेशी निवेशकों का व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा।”
गौरतलब है कि साल 2018 की शुरुआत में ही अरुण जेटली ने कहा था कि नए ऋणशोधन व दिवालिया संहिता (आईबीसी) में समाधान की एक रूपरेखा प्रस्तुत की गई है, जिससे निगमों को अपने बही खातों को दुरुस्त करने और कर्ज को कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही, सरकार ने एक और महत्वपूर्ण प्रस्ताव के जरिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के बही खातों को सुदृढ़ बनाने के लिए पुनर्पूजीकरण पैकेज (जीडीपी का करीब 1.2 फीसदी) की घोषणा की है।
इस बात का भी जिक्र किया गया है कि पूर्व की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के 10 साल के कार्यकाल में तेजी के दौरान भारतीय बैंकिंग प्रणाली में एनपीए की जड़ गहरी हो गई, जब यह आश्चर्यजनक ढंग से बढ़कर करीब नौ लाख करोड़ रुपये हो गई। भारतीय रिजर्व बैंक ने नए ऋणशोधन व दिवालिया संहिता के तहत 12 खातों के समाधान का जिक्र किया है, जिसकी कुल राशि सकल एनपीए का 25 फीसदी है।
सरकार ने डूबे हुए कर्ज को लेकर द्विआयामी रणनीति अपनाई है। एक तरफ, सरकार ने आईबीसी को अमल में लाया है, जिसके तहत छह माह की अवधि के लिए ऋणशोधन समाधान की प्रक्रिया शुरू की गई है, तो दूसरी तरफ सरकार ने सरकारी बैंकों के पुनर्पूजीकरण के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने कहा है कि बैंकों को एनपीए की समस्या के समाधान के लिए अपने डूबे हुए कर्ज के 60 फीसदी की कटौती करनी होगी।

