भारत को जब 1947 में आजादी मिली तो वो एक खुली अर्थव्यवस्था वाला देश था लेकिन 1950 के दशक में सरकार ने बड़े कारोबारों पर कई तरह की पाबंदियां लगा दीं। निजी स्वामित्व वाले बड़े कारोबार को ‘बुरे’ माने जाने लगे। आजादी के करीब चार दशक बाद 1991 में पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था में “उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण” के दरवाजे खोल दिए। बड़े निजी कारोबारी समूह और विदेश निवेश विकास की पहचान माने जाने लगे। भारतीय कारोबार जगत में आमूलचूल बदलाव के बावजूद एक चीज आजादी से अब तक नहीं बदली, वो है भारतीय अर्थव्यवस्था में पारिवारिक स्वामित्व वाले कारोबारी समूहों का दबदबा। 2016 के आंकड़ों के अनुसार भारत के शीर्ष 20 कारोबारी समूहों में 15 पारिवारिक स्वामित्व वाले हैं
वित्त वर्ष 2016 के अंत तक पारिवारिक स्वामित्व वाले कारोबारी समूहों की कुल संपत्ति करीब 26 लाख करोड़ रुपये है। ये राशि शीर्ष 20 कारोबारी समूहों की कुल संपत्ति की 84 प्रतिशत है। पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियों ने वित्त वर्ष 2016 में करीब 18 लाख करोड़ रुपये की कमाई की। ये राशि शीर्ष 20 कंपनियों की आमदनी की करीब 80 प्रतिशत है। इन आंकड़ों से साफ है कि उदारीकरण के बाद भी भारतीय कारोबार जगत के इस विशेष प्रवृत्ति में बड़ा बदलाव नहीं आया है। आजादी के समय भी देश के शीर्ष 20 कारोबारी समूहों में पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियों की करीब इतनी ही हिस्सेदारी थी।
पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियों के दबदबे के बावजूद पिछले सात दशकों में एक बड़ा बदलाव जरूर दिखाई देता है। 1950 के दशक में पारिवारिक स्वामित्व वाली जो कंपनियां देश के शीर्ष 20 में थीं उनमें से कुछ ही कंपनियां आने वाले दशकों में अपनी जगह बचा पाईं। आज जो कारोबारी समूह बहुत बड़े बन चुके हैं वो आजादी के समय बहुत छोटे थे या उन्होंने आजादी के बाद हुए आर्थिक विकास के दौर में अपनी जगह बनाई। प्रमुख तौर पर केवल तीन कारोबारी समूह टाटा, बिरला (एवी) और महिंद्रा 1951 से अब तक देश के शीर्ष 20 कारोबारी समूहों में अपनी जगह बरकरार रखे हुए हैं। हालांकि बिरला समूह की एक ही कंपनी आज भी अपना प्रभाव कायम रखे हुए है।
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भारत के मौजूदा शीर्ष 20 कारोबारी समूहों में से 16 ने आजादी के बाद के आर्थिक विकास का लाभ उठाया। इन 16 कंपनियों के पास शीर्ष 20 कंपनियों की कुल संपत्ति का दो-तिहाई संपत्ति है। वहीं वित्त वर्ष 2016 में शीर्ष 20 कंपनियों की आमदनी का 70 प्रतिशत इन 16 कंपनियों के खाते में गया। 1991 में लागू किए गए आर्थिक सुधार ने भी कई कंपनियों को नई कारोबारी ऊर्जा दी। मौजूदा शीर्ष 20 कंपनियों में से नौ कंपनियां ऐसी हैं जिन्होंने आर्थिक सुधारों का लाभ लेकर अपने कारोबार का विस्तार किया है। ऐसे समूहों में भारती, अडानी, जीएमआर, एचडीएफसी और जेपी समूह प्रमुख हैं।
सूचना प्रोद्यौगिकी क्षेत्र में आई क्रांति की वजह से भारत की मौजूदा शीर्ष 20 कंपनियों में 15वें और 16वें स्थान पर क्रमशः इंफोसिस और विप्रो जैसी आईटी कंपनियां हैं। वहीं आईटीकंपनी टाटा कंसल्टेंसी भी टाटा समूह की सबसे अधिक मुनाफा कमाने वाली कंपनी रही। वहीं आईटी कंपनी टेक महिंद्रा समूह की दूसरी सबसे ज्यादा कमाने वाली इकाई रही। विशेषज्ञों के अनुसार पारिवारिक स्वामित्व वाली जिन कंपनियों ने बदलती आर्थिक नीति के अनुरूप अपने को ढाल लिया उन्हें इसका लाभ मिला।
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