क्या वाकई लोग वही सुनते हैं जो वो सुनना चाहते हैं? जानिए 'कन्फर्मेशन बायस' का खेल

Jul 01, 2025, 04:29 PM
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जब भी हम किसी मुद्दे या बहस में उलझते हैं, तो क्या आपने महसूस किया है कि लोग अक्सर वही बातों को मानते हैं, जो उनके विचारों से मेल खाती हों?

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चाहे वह राजनीतिक बहस हो, धार्मिक मुद्दा हो या कोई साधारण सा तर्क – अधिकतर लोग अपने पक्ष के तथ्यों को ही प्राथमिकता देते हैं। इसे ही कहा जाता है: कन्फर्मेशन बायस (Confirmation Bias)।

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चलिए जानते हैं कि यह क्या होता है, क्यों होता है, और इसका हमारे सोचने और फैसले लेने की प्रक्रिया पर क्या असर पड़ता है।

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क्या है 'कन्फर्मेशन बायस'?

कन्फर्मेशन बायस एक मानसिक प्रवृत्ति (Cognitive Bias) है जिसमें व्यक्ति केवल उन्हीं जानकारियों, तथ्यों या विचारों को महत्व देता है जो उसके पहले से मौजूद विश्वास या राय की पुष्टि करते हैं। जो विचार उनके पक्ष में नहीं होते, उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है, भले ही वे सही क्यों न हों।

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उदाहरण के लिए:

अगर कोई व्यक्ति मानता है कि होम्योपैथी असरदार है, तो वह उन खबरों और शोधों पर ज्यादा भरोसा करेगा जो होम्योपैथी के फायदे गिनाते हैं, जबकि बाकी मेडिकल रिसर्च को नजरअंदाज कर देगा जो इसके असर पर सवाल उठाते हैं।

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यह बायस कैसे काम करता है?

सूचना का चयन (Selective Exposure) – हम वही किताबें पढ़ते हैं, वही वीडियो देखते हैं या वही चैनल फॉलो करते हैं जो हमारी सोच के अनुकूल हों।

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विचारों की व्याख्या (Selective Interpretation) –

अगर कोई तथ्य हमारी सोच के खिलाफ है, तो हम उसे गलत या संदिग्ध मान लेते हैं।

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याददाश्त में भेदभाव (Selective Memory) –

हम उन्हीं बातों को याद रखते हैं जो हमारे विचारों की पुष्टि करें।

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यह हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करता है?

निर्णय लेने में पक्षपात: हम तटस्थ होकर सोच नहीं पाते, जिससे गलत फैसले लिए जा सकते हैं।

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बहसों में टकराव बढ़ता है:

हर कोई अपने पक्ष को सही साबित करने में लग जाता है, जिससे सार्थक संवाद असंभव हो जाता है।

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सोशल मीडिया का बुलबुला:

एल्गोरिद्म हमें वही कंटेंट दिखाते हैं जो हम देखना चाहते हैं, जिससे हमारी सोच और सीमित होती जाती है।

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इनोवेशन में बाधा:

अगर हम केवल वही देखते हैं जो हमें अच्छा लगता है, तो हम नई सोच या आलोचना को स्वीकार नहीं कर पाते।

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कन्फर्मेशन बायस से कैसे बचें?

न्यूट्रल सोर्सेज से जानकारी लें। जानबूझकर एडवर्स ओपिनियन पढ़ें और समझें। खुद से सवाल करें, 'क्या मैं सही सोच रहा/रही हूं'? समय-समय पर अपनी मान्यताओं का रिव्यू करें।

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