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मर्जी मुताबिक इस द्वीप के लोग बदलते हैं बीवियां, क्रिकेट से सुलझा लेते हैं विवाद

जानना चाहेंगे यह सब कहां होता है। इसके लिए आपको दुनिया के दूसरे सबसे बड़े द्वीप पर चलना होगा...

दुनिया में एक से एक अनोखी जनजातियां हैं। इनमें कुछ खूंखार मानी जाती हैं, तो कुछ रस्म-रिवाजों के चलते अजीब कही जाती हैं। इस लिस्ट में ऐसी भी जनजाति है, जिसमें लोग मर्जी के हिसाब से बीवियां बदल लेते हैं। बच्चा पैदा होना इनके लिए चमत्कार है। टीनएजर्स पार्टनर्स तलाश सकें, इसलिए खास किस्म की झोपड़ी होती है। ये केले के पत्तों को करेंसी मानते हैं और क्रिकेट मैच खेल कर आपसी विवाद सुलझा लेते हैं।

हम पापुआ न्यू गिनी की बात कर रहे हैं। यह द्वीप ग्रीन लैंड के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा द्वीप है। यहां ट्रोब्रिएंडर्स (Trobrianders) नाम की जनजाति रहती है, जो अपनी परंपराओं और जीवनशैली से काफी अलहदा है।

यहां के ज्यादातर गांवों में एक झोपड़ी होती है। उसे बुकुमतुला (Bukumatula) कहते हैं। यह किशोर-किशोरियों के लिए होती हैं, जिसकी मदद से वे पार्टनर तलाशते हैं। वे सेक्सुअल बीमारियां की चपेट में न आएं, इसके लिए झोपड़ी में कंडोम और बाकी कॉन्ट्रासेप्टिव आइटम्स भी होते हैं।

ट्रोब्रिएंडर्स के लिए बच्चे पैदा होना किसी चमत्कार से कम नहीं है। वे इनका सेक्स और प्रेग्नेंसी से कोई लेना-देना नहीं मानते। वहीं, केले के पत्तों को ये लोग करेंसी मानते हैं। यहां पचास पत्तियां एक यूरो के बराबर होती हैं।

भारत में क्रिकेट भले ही पूजा जाता हो, लेकिन यहां यह झगड़े सुलझाने के काम आता है। क्रिकेट की शुरुआत यहां कोलोनियल अथॉरिटीज़ ने की थी। तब से यहां के लोग झगड़ा नहीं करते। वे खेल के जरिए मनभेद मिटाते हैं। महिलाएं भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं।

पापुआ न्यू गिनी को 1793 में वेस्ट ने खोजा था। द्वीप का नाम तब डेनिस डे ट्रोब्रिएंड ( Denis de Trobriand) के नाम पर रखा गया, जो कि फांस के जहाज (पानी वाले) के लेफ्टिनेंट थे। लेकिन इसे पहचान साल 1894 में मिली, जब यहां मेथडिस्ट मिशनरी पहुंचे। बाद में इसका नाम पापुआ न्यू गिनी पड़ा।

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