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अजब-गजब फरमान: सूअर को फांसी तो मुर्गी को जिंदा जला देने की सजा

सन् 1906 में लंदन के डब्ल्यू हेनमन (W.Heinemann) प्रकाशन ने एक पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था The Criminal Prosecution and Capital Punishment of Animals। इस पुस्तक में इस बात का दावा किया गया है कि विभिन्न अपराधों के लिए जानवरों पर मुकदमा चलाया गया और कुछ मामले में तो फांसी भी दी गई।

Author September 24, 2018 6:40 PM
जानवरों पर चले मुकदमे के बाद उन्हें सजा भी हुई।

अब तक आपने कई अपराधियों को सजा होते सुना होगा। लेकिन क्या आपने कभी किसी जानवर पर मुकदमा चलाए जाने और उसे सजा मिलने की बात सुनी है। दुनिया के कई अलग-अलग देशों में कई बार जानवरों पर मुकदमे हुए हैं और फिर अदालत से उन्हें सजा भी सुनाई गई है। दरअसल सन् 1906 में लंदन के डब्ल्यू हेनमन (W.Heinemann) प्रकाशन ने एक पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था The Criminal Prosecution and Capital Punishment of Animals। इस पुस्तक में इस बात का दावा किया गया है कि विभिन्न अपराधों के लिए जानवरों पर मुकदमा चलाया गया और कुछ मामले में तो फांसी भी दी गई।

मुर्गे को मिली जिंदा जला देने की सजा:
The Criminal Prosecution and Capital Punishment of Animals के मुताबिक सन् 1474 ईस्वी में स्विट्जरलैंड में एक मुर्गे पर मुकदमा चला गया था। इस मुर्गे पर अंडा देने का मामला दर्ज किया गया था। इतना ही नहीं मुर्गे के अंडा देने को जघन्य और अप्राकृतिक अपराध माना गया था। बाद में सुनवाई पूरी होने पर अदालत ने इस मुर्गे को जिंदा जला देने की सजा सुनाई।

गजराज को दी गई फांसी:
किताब में छपी एक घटना के मुताबिक वर्ष 1916 में गजराज को अदालत ने फांसी की सजा मुकर्रर की थी। इस हाथी का नाम मैरी था। मैरी पर आरोप था कि उसने सर्कस के शो के दौरान अपने ट्रेनर की बेरहमी से हत्या कर दी थी। हत्या का जुर्म साबित होने पर उसे फांसी की सजा दी गई।

सांड को मिली सजा:
इसी तरह सन 1314 में एक सांड ने सड़क पर जा रहे एक राहगीर पर हमला कर दिया। इस हमले में यह राहगीर बुरी तरह घायल हो गया था। इस मामले में सांड पर मुकदमा चला और उसे फांसी दे दी गई।

सुअर को हुई फांसी:
इस किताब के मुताबिक साल 1386 में एक सुअर को शिशु की हत्या का दोषी पाया गया। दिलचस्प बात यह है कि इस केस मे सुअर को फांसी की सजा हुई। फांसी देने से पहले इस सुअर को अपराधियों की तरह ही चेहरे पर मास्क भी पहनाया गया।

W.Heinemann प्रकाशन की इस पुस्तक में बतलाया गया है कि 16वीं सदी में फ्रांस में चूहों पर जौ के खेत को नष्ट करने का आरोप लगा था। चूहों की पैरवी एक वकील ने की। खास बात यह भी है कि अपने मुवक्किल का बचाव करते हुए कोर्ट में वकील ने कहा कि गांव की बिल्लियों के डर से चूहे अदालत में हाजिर नहीं हो सके। बाद में इस मामले में चूहों को सजा नहीं हुई।

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