Feb 20, 2026

डायनासोर के युग से भी पहले से धरती पर रह रहे हैं कॉकरोच, इनको खत्म करना है बहुत मुश्किल, जानिए वैज्ञानिक वजह

Archana Keshri

कॉकरोच को देखकर ज्यादातर लोगों को घिन आती है। लेकिन विज्ञान की नजर में यह पृथ्वी के सबसे सक्सेसफुल जीवों में से एक हैं। ये न सिर्फ करोड़ों साल से अस्तित्व में हैं, बल्कि उन घटनाओं से भी बच गए जिनमें पृथ्वी की अधिकांश प्रजातियां खत्म हो गईं।

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नेचुरल सेलेक्शन के सिद्धांत को समझाने वाले वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने बताया था कि प्रकृति सुंदरता को नहीं, बल्कि एडेप्टेबिलिटी को इनाम देती है। कॉकरोच इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

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कॉकरोच, जिन्हें वैज्ञानिक रूप से Blattodea कहा जाता है, पृथ्वी पर लगभग 30 करोड़ (300 मिलियन) सालों से मौजूद हैं। यानी वे डायनासोर के आने से भी करीब 10 करोड़ साल पहले इस धरती पर थे। इतिहास में आए कई महाविनाश उनके सामने टिक नहीं पाए।

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किन-किन आपदाओं से बच निकले कॉकरोच?

पर्मियन महाविलुप्ति (Permian Mass Extinction) – लगभग 25.2 करोड़ वर्ष पहले, जब पृथ्वी की 90% से अधिक प्रजातियां खत्म हो गईं। वह एस्टेरॉयड टक्कर जिसने डायनासोर का अंत किया।

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कई हिमयुग (Ice Ages), बड़े जलवायु परिवर्तन, और आज की ह्यूमन सिविलाइजेशन, जहां असंख्य प्रजातियां विलुप्त (extinct) हो गईं, वहां कॉकरोच लगातार बने रहे।

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सिर कटने के बाद भी कैसे जिंदा रहते हैं?

यह सुनकर हैरानी होती है, लेकिन कॉकरोच सिर कटने के बाद भी कई दिनों तक जीवित रह सकते हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं, वे इंसानों की तरह नाक से नहीं, बल्कि शरीर के किनारों पर मौजूद छोटे छिद्रों (spiracles) से सांस लेते हैं।

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उनके शरीर में विकेंद्रीकृत तंत्रिका तंत्र (Decentralized Nerve Ganglia) होता है, यानी हर काम के लिए दिमाग पर निर्भरता नहीं होती।

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सिर कटने के बाद वे भूख या खून बहने से नहीं, बल्कि पानी की कमी (dehydration) से मरते हैं। दिमाग के बिना भी उनके शरीर की मूल क्रियाएं कुछ समय तक चलती रहती हैं।

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क्या सच में वे न्यूक्लियर ब्लास्ट से भी बच सकते हैं?

इन्हें लेकर एक धारणा ये भी प्रचलित है कि परमाणु विस्फोट के बाद केवल कॉकरोच ही बचेंगे। हालांकि वे पूरी तरह 'इम्मोर्टल' नहीं हैं, लेकिन वे इंसानों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक रेडिएशन सहन कर सकते हैं।

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क्यों?

रेडिएशन तेजी से विभाजित होने वाली कोशिकाओं (cells) को अधिक नुकसान पहुंचाता है। कॉकरोच की कोशिकाएं तुलना में धीमी गति से विभाजित होती हैं, इसलिए वे अधिक रेडिएशन झेल पाते हैं। यह कोई जादू नहीं, बल्कि बायोलॉजिकल स्ट्रक्चर का परिणाम है।

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वैज्ञानिक संस्थानों जैसे नेशनल ज्योग्राफिक और स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के अनुसार, कॉकरोच की जीवित रहने की क्षमता का कारण उनका सिंपल लेकिन हायली इफेक्टिव बायोलॉजिकल ढांचा है।

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