Feb 16, 2026
वैज्ञानिकों ने पौधों से बनी ऐसी च्युइंग गम तैयार की है जो मुंह में मौजूद खतरनाक वायरस को निष्क्रिय कर सकती है। शुरुआती शोध में दावा किया गया है कि यह गम लार में पाए जाने वाले कुछ वायरस को 95% से अधिक तक कम कर सकती है। यह खोज रेस्पिरेटरी और ओरल इन्फेक्शन की रोकथाम की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
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यह रिसर्च University of Pennsylvania School of Dental Medicine के वैज्ञानिकों द्वारा की गई है। इस रिसर्च का टाइटल 'Plant-Based Prophylactic Chewing Gum for the Neutralization of Respiratory and Oral Viruses' है, जिसे प्रोफेसर हेनरी डैनिएल (H. Daniell) की टीम ने विकसित किया।
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यह खास च्युइंग गम पौधों में उगाए गए खास प्रोटीन से तैयार की गई है। ये प्रोटीन 'मॉलिक्यूलर डिकॉय' की तरह काम करते हैं, यानी वे वायरस को ह्यूमन सेल्स तक पहुंचने से पहले ही अपने साथ बांध लेते हैं।
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एक संस्करण में पौधों में उगाया गया ACE2 प्रोटीन शामिल है, जो SARS-CoV-2 (कोविड-19 वायरस) से जुड़कर उसे निष्क्रिय (Inactive) करता है।
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दूसरा संस्करण FRIL नामक प्रोटीन का उपयोग करता है, जो लैबलैब बीन्स से प्राप्त होता है और इन्फ्लुएंजा व हर्पीज जैसे वायरस को टारगेट करता है।
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जब कोई व्यक्ति इस गम को चबाता है, तो ये प्रोटीन लार में मौजूद वायरस कणों से चिपक जाते हैं। इससे वायरस ह्यूमन सेल्स में प्रवेश नहीं कर पाते और लार में वायरल लोड काफी कम हो जाता है।
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लैब परीक्षणों में पाया गया कि केवल 40 मिलीग्राम बीन्स-आधारित गम इन्फ्लुएंजा और हर्पीज वायरस के स्तर को 95% से अधिक तक कम करने में सक्षम रही।
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रिसर्चर्स के अनुसार, मुंह में वायरस की मात्रा कम करना संक्रमण के फैलाव को रोकने में बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि बातचीत, खांसी या छींक के दौरान यही वायरस हवा में फैलते हैं।
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यह गम कमरे के तापमान पर दो साल से अधिक समय तक स्थिर रह सकती है। इसे FDA के क्लिनिकल-ग्रेड मानकों के अनुसार तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य खासकर स्कूल, डेंटल क्लीनिक और पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे सबसे ज्यादा जोखिम वाले स्थानों पर संक्रमण को कम करना है।
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अभी इस च्यूइंग गम के क्लिनिकल ह्यूमन ट्रायल किए जाने का प्रोसेस चल रहा है। आगर परिणाम सफल रहे, तो यह च्युइंग गम सीजनल इंफेक्शन और महामारी के दौरान इंफेक्शन को फैलने से रोकने का एक सस्ता और आसान तरीका बन सकती है।
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हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक ह्यूमन ट्रायल के परिणाम सामने नहीं आते, तब तक इसे वैक्सीन या अन्य सुरक्षा उपायों का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि पोटेंशियल हेल्पर रेमेडी के रूप में देखा जाना चाहिए।
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