Feb 25, 2025

पूरे एशिया में सबसे पहले भारत के इस शहर में जली थी इलेक्ट्रिक स्ट्रीट लाइट

Archana Keshri

आज भारत के हर शहर, कस्बे और गांव में बिजली की व्यवस्था है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एशिया में पहली बार इलेक्ट्रिक स्ट्रीट लाइट भारत के एक शहर में जलाई गई थी?

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यह ऐतिहासिक घटना साल 1905 को बेंगलुरु (तब बैंगलोर) में हुई थी। बेंगलुरु न केवल भारत बल्कि पूरे एशिया का पहला शहर बना जहां बिजली से जलने वाली स्ट्रीट लाइट लगाई गई थी।

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यह कहानी सिर्फ एक लाइट जलाने की नहीं, बल्कि भारत में बिजलीकरण की एक ऐतिहासिक उपलब्धि की है। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक पल से जुड़े रोचक किस्से और इसके पीछे की पूरी कहानी।

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कैसे हुई भारत में बिजली की शुरुआत?

19वीं सदी के अंत तक भारत में बिजली की कोई व्यवस्था नहीं थी। लोग रोशनी के लिए घी के दीपक, मिट्टी के तेल के दीये और लैम्पों पर निर्भर थे। भारत में पहली बार बिजली की सुविधा कोलकाता (तब कलकत्ता) में 1879 में आई।

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1896 में भारत का पहला हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर स्टेशन दार्जिलिंग में बना। लेकिन स्ट्रीट लाइट की बात करें तो पहली इलेक्ट्रिक स्ट्रीट लाइट 5 अगस्त 1905 को बेंगलुरु में जलाई गई।

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बेंगलुरु में पहली इलेक्ट्रिक स्ट्रीट लाइट कैसे लगी?

बात 1902 की है, जब बेंगलुरु की सड़कों पर मिट्टी के तेल (केरोसीन) से जलने वाले लैम्प लगाए जाते थे। इन लैम्पों को जलाने, साफ करने और मेंटेन करने के लिए तीन कर्मचारियों को रखा गया था।

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वहीं, इन सभी पर नजर रखने के लिए एक मैनेजर भी रखा गया। ये काम काफी मुश्किल था। इसमें काफी दिक्कतें आती थीं, इसलिए बिजली की जरूरत महसूस होने लगी।

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मैसूर स्टेट का योगदान

जिसके बाद, मैसूर के तत्कालीन दीवान पी.एन. कृष्णमूर्ति को एक ब्रिटिश इंजीनियर मेजर A.C.J. de Lotbiniere ने बेंगलुरु को बिजली से रोशन करने का सुझाव दिया। उन्होंने शिवानासमुद्र (कावेरी नदी) पर भारत का दूसरा हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर स्टेशन बनाने की मंजूरी दी।

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1902 में यह पावर स्टेशन बनकर तैयार हुआ और इससे के.जी.एफ़ (कोलार गोल्ड फील्ड्स) की सोने की खदानों को बिजली देने का काम शुरू हुआ। कुछ सालों में इस पावर स्टेशन से बेंगलुरु शहर को भी बिजली की आपूर्ति की जाने लगी।

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5 अगस्त 1905 - जब बेंगलुरु रोशन हुआ

बेंगलुरु में पहली स्ट्रीट लाइट लगाने की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। अगस्त 1905 के पहले हफ्ते में यह ऐतिहासिक दिन आया। 5 अगस्त 1905 की शाम, मैसूर स्टेट के सभी महत्वपूर्ण लोग विक्टोरिया हॉस्पिटल (तब दिल्ली गेट) के पास एकत्रित हुए।

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भारत सरकार के तत्कालीन बिजली सलाहकार जे. डब्ल्यू. मीयर्स (J.W. Mears) ने स्विच ऑन किया, और बेंगलुरु की पहली स्ट्रीट लाइट जल उठी। यह सिर्फ बेंगलुरु ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया की पहली इलेक्ट्रिक स्ट्रीट लाइट थी।

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इस घटना का जिक्र प्रसिद्ध लेखिका मीरा अय्यर ने अपनी किताब ‘Discovering Bengaluru: History, Neighbourhoods, Walks’ में किया है। हालांकि, इस तारीख को लेकर कुछ भ्रम है। एक पुराने अखबार की कटिंग के मुताबिक, यह खबर 4 अगस्त को छपी थी, जिससे अंदाजा लगाया जाता है कि यह स्ट्रीट लाइट 3 अगस्त 1905 को जलाई गई थी।

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बेंगलुरु में बिजलीकरण का तेजी से विस्तार

पहली स्ट्रीट लाइट के बाद बेंगलुरु में बिजलीकरण तेजी से बढ़ा। एक साल के अंदर शहर में 831 नई स्ट्रीट लाइट लगा दी गईं और 1639 घरों को बिजली के कनेक्शन भी मिल गए। धीरे-धीरे पूरे शहर में बिजली की व्यवस्था को मजबूत किया गया और बेंगलुरु भारत के सबसे पहले पूरी तरह बिजलीकरण वाले शहरों में से एक बन गया।

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बेंगलुरु – भारत का 'सिलिकॉन वैली' बनने की शुरुआत

आज बेंगलुरु को भारत की 'सिलिकॉन वैली' कहा जाता है, क्योंकि यह देश का सबसे बड़ा टेक्नोलॉजी हब बन चुका है। पहली स्ट्रीट लाइट के जलने के साथ ही बेंगलुरु ने भारत में बिजलीकरण का नेतृत्व किया। IT इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी हब बनने का सफर भी यहीं से शुरू हुआ।

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