Mar 23, 2026

क्यों कहा जाता है ‘लाइमलाइट’, थिएटर की रोशनी से जुड़ी दिलचस्प कहानी

Archana Keshri

हम अक्सर सुनते हैं- 'वो हमेशा लाइमलाइट में रहता है' या 'उसे लाइमलाइट पसंद नहीं है।' आज यह शब्द शोहरत, लोकप्रियता और लोगों के ध्यान का प्रतीक बन चुका है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ‘लाइमलाइट’ शब्द की असली शुरुआत कहां से हुई?

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19वीं सदी की एक खोज से निकला शब्द

‘लाइमलाइट’ की कहानी हमें 19वीं सदी में ले जाती है। उस समय थिएटर में आधुनिक बिजली की रोशनी नहीं थी, इसलिए मंच को रोशन करने के लिए नए-नए प्रयोग किए जाते थे। इसी दौरान एक ब्रिटिश आविष्कारक Goldsworthy Gurney ने एक खास तरह का ब्लो पाइप बनाया।

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यह ब्लो पाइप हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैस को मिलाकर बेहद तेज और गर्म लौ पैदा करता था। जब इस तेज लौ में ‘क्विकलाइम’ (चूना पत्थर से बना पदार्थ) को रखा गया, तो उससे एक चमकदार सफेद रोशनी निकलती थी। इसी तेज रोशनी को ‘लाइमलाइट’ कहा गया।

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थिएटर में स्पॉटलाइट की तरह इस्तेमाल

उस दौर में इस रोशनी का इस्तेमाल थिएटर में खास कलाकारों पर फोकस डालने के लिए किया जाने लगा। यानी मंच पर जो एक्टर सबसे महत्वपूर्ण होता था, उस पर 'लाइमलाइट' डाली जाती थी।

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यह ठीक वैसा ही था जैसे आज के समय में स्पॉटलाइट का इस्तेमाल होता है। धीरे-धीरे ‘लाइमलाइट’ सिर्फ एक तकनीकी शब्द नहीं रहा, बल्कि इसका मतलब बन गया, वह व्यक्ति जो सबके ध्यान का केंद्र हो।

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थिएटर से सिनेमा तक का सफर

समय के साथ थिएटर की यह तकनीक खत्म हो गई और उसकी जगह बिजली की लाइट्स ने ले लीं। लेकिन ‘लाइमलाइट’ शब्द लोगों की भाषा में बना रहा। जब सिनेमा का दौर आया, तो यह शब्द वहां भी इस्तेमाल होने लगा।

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आज ‘लाइमलाइट में होना’ का मतलब है- मीडिया, लोगों और समाज का ध्यान आकर्षित करना। खासकर फिल्मी सितारों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के लिए यह शब्द आम हो गया है।

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भाषा में बदलता अर्थ

दिलचस्प बात यह है कि एक समय यह शब्द सिर्फ रोशनी के लिए इस्तेमाल होता था, लेकिन आज यह पूरी तरह एक रूपक (metaphor) बन चुका है। अब ‘लाइमलाइट’ का संबंध किसी व्यक्ति की लोकप्रियता, पहचान और चर्चा में रहने से है।

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