शर्मा एनक्लेव, मुबारकपुर दाबास की तंग गलियों में सड़कें अब खुले नालों में बदल चुकी हैं। कच्चा सीवेज फूट-फूटकर बह रहा है, हर बारिश में जहरीला पानी घरों, दुकानों और बच्चों के खेलने के मैदानों में घुस आता है। लोग अपने ही टॉयलेट के गंदे पानी में डूबकर जी रहे हैं—बच्चे इसमें खेलते हैं, बुजुर्ग फिसलकर गिरते हैं, बीमारियाँ फैल रही हैं। बार-बार एमसीडी से शिकायत करने पर वही पुराने
बहाने: “फंड पेंडिंग है”, “काम चल रहा है”, या बस खामोशी। जो शहर विकास का दावा करता है, वहाँ बुनियादी सफाई लग्जरी बन गई है। यह कोई संयोग नहीं—यह लालच और लापरवाही की साजिश है, जहाँ ठेके कनेक्शनवालों को मिलते हैं, मेंटेनेंस भूल जाता है, और आम आदमी अपनी जान, सेहत और सम्मान की कीमत चुकाता है। जब तक सिस्टम सत्ता के चाटुकारों की रक्षा करना बंद नहीं करेगा और जनता की सेवा शुरू नहीं करेगा, ये गंदे गलियाँ उदासीनता की कब्रगाह बनी रहेंगी।
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