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SC/ST को प्रमोशनः आरक्षण के लिए मानदंड तय करने से कोर्ट की न, कहा- सूबे ये आंकड़े जुटाने को हैं बाध्य

मंडल आयोग के फैसले में प्रमोशन में कोटा (आरक्षण) की संभावना को खारिज कर दिया गया था।

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तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः freepik.com)

सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों (Scheduled Castes : SC) और अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes : ST) के लोगों को प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए कोई मानदंड तय करने से सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (28 जनवरी, 2022) को इन्कार कर दिया। जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बी आर गवई की तीन सदस्यों वाली बेंच ने कहा कि राज्य सरकारें एससी/एसटी के प्रतिनिधित्व में कमी के डेटा जुटाने के लिए बाध्य हैं।

बेंच आगे बोली, ‘‘बहस के आधार पर हमने दलीलों को छह बिंदुओं में बांटा। एक मानदंड का है। जरनैल सिंह और नागराज केस के आलोक में हमने कहा है कि हम कोई मानदंड निर्धारित नहीं कर सकते। मात्रात्मक डेटा (Quantifiable Data) जुटाने के लिहाज से हमने कहा है कि सूबे ये आंकड़े एकत्रित करने को बाध्य हैं।’’

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, टॉप कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के बारे में सूचनाओं को जुटाने को पूरी सर्विस या कैटेगरी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। इसे उन पोस्ट्स की श्रेणी या ग्रेड के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिन पर प्रमोशन मांगा गया है। बेंच के मुताबिक, ‘‘अगर एससी/एसटी के प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़े पूरी सेवा के संदर्भ में होते हैं तो प्रमोशन वाले पदों के बारे में Quantifiable Data को जुटाने वाली इकाई (जो कैडर होनी चाहिए) का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।’’

सही अनुपात में प्रतिनिधित्व को लेकर कोर्ट ने बताया कि उसने इस पहलू को नहीं देखा है। संबंधित कारकों को ध्यान में रखते हुए प्रमोशन में एससी/एसटी के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का पता लगाने का काम सूबों पर छोड़ दिया है। बता दें कि कोर्ट ने 26 अक्टूबर, 2021 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इससे पहले, केंद्र ने बेंच से कहा था कि सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण लागू करने के लिए केंद्र और राज्यों सरकारों के लिहाज से एक तय और निर्धायक आधार तैयार किया जाए। केंद्र की तरफ से तब अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने दलील रखी थी कि एससी/एसटी को सालों तक मुख्यधारा से अलग रखा गया है। ‘‘हमें उन्हें बराबरी का अवसर देने के लिए देश के हित में समानता (आरक्षण के संदर्भ में) लानी होगी।’’

अटॉर्नी जनरल का बयान था, ‘‘अगर आप राज्यों और केंद्र के लिए तय निर्णायक आधार निर्धारित नहीं करते तो बड़ी संख्या में याचिकाएं आएंगी। इस मुद्दे का कभी अंत नहीं होगा कि किस सिद्धांत पर आरक्षण देना है।’’ वेणुगोपाल ने टॉप कोर्ट के 1992 के इंदिरा साहनी मामले से लेकर 2018 के जरनैल सिंह मामले तक का जिक्र किया था। इंदिरा साहनी मामले को मंडल आयोग मामले के नाम से जाना जाता है।

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