कैसे बदला जाता है रेलवे स्टेशन का नाम, फेरबदल के बाद की क्या है प्रक्रिया और कैसे तय होती है साइनबोर्ड के लिए स्पेलिंग? जानिए

एक आम गलत धारणा है- भारतीय रेलवे अपने स्टेशनों के नाम बदल सकता है। पर असल में ऐसा नहीं है। भारतीय रेलवे स्टेशन का मालिक हो सकता है, मगर वह इसका नामकरण करने के मामले में शामिल नहीं होता।

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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर लगी यात्रियों की भीड़। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः प्रेमनाथ पांडे)

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदल दिया गया है। यह अब से रानी कमलापति रेलवे स्टेशन के नाम से जाना जाएगा। वैसे, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब किसी रेलवे स्टेशन का नाम बदला गया हो।

मोदी सरकार के कार्यकाल में और उससे पहले भी कई सारे रेलवे स्टेशंस के नाम बदले जा चुके हैं। पर क्या आप इसके पीछे की पूरी प्रक्रिया जानते हैं? आइए जानते हैं कि एक रेलवे स्टेशन का नाम कैसे बदला जाता है, उसे बदलने की क्या प्रोसेस है और वहां लगने वाले साइनबोर्ड के लिए स्पेलिंग किस आधार पर तय होती है:

क्यों बदल दिए जाते हैं नाम?: रेलवे स्टेशंस के नाम बदलना इनदिनों नई बात नहीं है। वह भी ऐसे वक्त में जब राज्य सरकारें लंबे समय से चली आ रही लोकप्रिय मांग या इतिहास का प्रतिनिधित्व करने के लिए या एक व्यापक आइकनोग्राफी पर जोर देने वाली राजनीतिक परियोजना के हिस्से के रूप में नाम बदलने का फैसला करती हैं। मसलन साल 1996 में इतिहास और स्थानीय भावनाओं को रेखांकित करने के लिए मद्रास शहर को आधिकारिक तौर पर ‘चेन्नई’ नाम दिया गया। नतीजतन रेलवे स्टेशन का नाम भी मद्रास से बदलकर चेन्नई किया गया।

2014 के बाद से कई स्टेशनों को नए नाम मिले हैं। उनमें से सबसे उल्लेखनीय मुगलसराय जंक्शन था, जो 1968 में मुगलसराय में मृत पाए गए दक्षिणपंथी विचारक का सम्मान करने के लिए साल 2018 में पंडित दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन बन गया। इसी साल यूपी में सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया।

देर से ही सही वाराणसी में मंडुआडीह स्टेशन का भी नाम बदला गया। वह अब बनारस के नाम से जाना जाता है। इस नाम की मांग इसलिए बुलंद हुई थी, ताकि उस नाम को दर्शाया जा सके जिससे शहर जाना जाता है। शहर का प्रतिनिधित्व करने वाले बड़े स्टेशन को पहले से ही वाराणसी जंक्शन कहा जाता है, जबकि इस साल दिवाली पर अयोध्या के बगल में फैजाबाद जंक्शन स्टेशन का नाम बदलकर अयोध्या छावनी स्टेशन कर दिया गया।

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भोपाल में इस स्टेशन को पीपीपी मोड के अंतर्गत रीडेवलप किया गया है। (फोटो सोर्स: टि्वटर/@M_Lekhi)

कैसे होता है बदलाव, जानें: एक आम गलत धारणा है- भारतीय रेलवे अपने स्टेशनों के नाम बदल सकता है। पर असल में ऐसा नहीं है। भारतीय रेलवे स्टेशन का मालिक हो सकता है, मगर वह इसका नामकरण करने के मामले में शामिल नहीं होता। यह चीज राज्य सरकार के विवेक पर है। स्टेशनों के नाम बदलना पूरी तरह से राज्य का विषय है, भले ही रेलवे केंद्र सरकार से संबंधित है।

राज्य सरकारें इन मामलों के लिए गृह मंत्रालय, नोडल मंत्रालय को अनुरोध भेजती हैं, जो रेल मंत्रालय को लूप में रखते हुए अपनी मंजूरी देता है। आमतौर पर यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रस्तावित नए नाम वाला कोई अन्य स्टेशन भारत में कहीं भी न हो। अगर कोई राज्य सरकार किसी शहर का नाम बदलना चाहती है, तो आम तौर पर, केंद्र के रास्ते में आने या पुराने नाम को प्रचलन में रखने का कोई कारण नहीं है, जिसमें उसकी संपत्तियों के संकेत भी हैं।

भारतीय रेलवे को ऐतिहासिक कारणों या स्थानीय भावनाओं का हवाला देते हुए स्टेशनों के नाम बदलने के लिए नागरिक समाज समूहों, राजनीतिक दलों और अन्य लोगों से नियमित प्रतिनिधित्व मिलता रहता है। अधिकतर मामलों में यह जवाब दिया जाता है कि यह राज्य सरकार और गृह मंत्रालय का मामला है।

नाम बदलने के बाद क्या होता है?: राज्य सरकार द्वारा सभी नियत प्रक्रिया का पालन करते हुए नाम बदलने की जानकारी दी जाती है, तब रेलवे जरूरी काम करने के लिए कदम बढ़ाता है। रेलवे संचालन उद्देश्यों के लिए नए स्टेशन “कोड” का आविष्कार करने की जरूरत हो सकती है। मान लें कि फैजाबाद जंक्शन का कोड “FD” हुआ करता था। पर अब नया कोड “AYC” है। नया नाम आगे टिकट प्रणाली में फीड किया जाता है, ताकि कोड के साथ नया नाम इसके टिकटों और आरक्षण और ट्रेन की जानकारी पर दिखाई दे। अंत में, यह सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए स्टेशन पर लिखे नाम- भवन, प्लेटफॉर्म साइनेज, आदि और इसके कम्युनिकेशन मटीरियल (संचार सामग्री) में भौतिक रूप से बदल दिया जाता है।

साइनबोर्ड पर होने वाली भाषाएं, वर्तनी कैसे तय की जाती हैं?: इस पहलू को भारतीय रेलवे वर्क्स मैनुअल के रूप में जाना जाता है। यह 260 पेज का दस्तावेज़ है, जो सिविल इंजीनियरिंग निर्माण कार्यों से संबंधित हर चीज को संहिताबद्ध करता है। परंपरागत रूप से, स्टेशन के नाम केवल हिंदी और अंग्रेजी में लिखे जाते थे। समय के साथ निर्देश दिया गया कि एक तीसरी भाषा (जो स्थानीय भाषा है) को शामिल किया जाना चाहिए।

फिर भी यह मामला इतना आसान नहीं है। नियमावली के पैराग्राफ 424 में कहा गया है कि रेलवे को अपने साइनबोर्ड पर नामों को लगाने से पहले संबंधित राज्य सरकार से नामों की वर्तनी (तीनों भाषाओं में) की मंजूरी लेनी चाहिए।

मैनुअल के मुताबिक, “स्टेशनों के नाम निम्नलिखित क्रम में प्रदर्शित किए जाएंगे: क्षेत्रीय भाषा, हिंदी और अंग्रेजी, तमिलनाडु को छोड़कर जहां हिंदी का उपयोग वाणिज्यिक विभाग द्वारा निर्धारित महत्वपूर्ण स्टेशनों और तीर्थ केंद्रों तक सीमित रहेगा। जहां क्षेत्रीय भाषा हिंदी है, वहां नाम बोर्ड दो भाषाओं में होंगे, हिंदी और अंग्रेजी…।”

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