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बड़ी स्क्रीन वाला टीवी खरीदना हो सकता है बेकार! एलईडी टेलिविजन खरीदते वक्त जरूर ध्यान में रखें ये बातें

टीवी पर तस्वीर कितनी बार दिखाई गई, यह चीज रीफ्रेश रेट बताता है। फिल्म और वीडियो में मूविंग इमेज होती हैं। यानी उनमें रीफ्रेश रेट अधिक होता है।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः पिक्साबे)

बड़ी स्क्रीन वाला टेलीविजन लेना सही रहेगा, कहीं उसके चक्कर में पैसे तो नहीं फंस जाएंगे? टीवी सेट खरीदने से पहले ज्यादातर लोगों के दिमाग में कुछ ऐसे ही सवाल कौंधते हैं। अगर आप भी नया टीवी लेने के बारे में सोच रहे हैं और इसी तरह के सवालों के बीच उलझे हैं, तो यह खबर आपकी समस्या का हल कर सकती है।

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह जरूरी नहीं है कि बड़ी स्क्रीन वाला टीवी ही अच्छा हो। सबसे जरूरी होता है टीवी और दर्शक के बीच का अंतर। यानी- आदर्श व्यूविंग डिस्टेंस। यह टीवी की स्क्रीन के आकार से डेढ़ या ढाई गुणा अधिक होना चाहिए। हालांकि, रेस्योल्यूशन अधिक होने पर आप टीवी पास बैठ कर भी देख सकते हैं। पर अच्छी पिक्चर क्वालिटी आदर्श व्यूइंग डिस्टेंस से ही मिलेगी। मसलन 55 इंच वाले 4के टीवी को कम से कम सात फुट के व्यूविंग डिस्टेंस से देखना चाहिए।

टीवी का आकार                         आदर्श व्यूइंग डिस्टेंस
65 इंच                                   8 से 14 फुट
55 इंच                                   7 से साढ़े 11 फुट
50 इंच                                   6 से 10 फुट
42 इंच                                   5.2 से 8.75 फुट
40 इंच                                   5 से 8 फुट
32 इंच                                   4 से 6 फुट

टीवी स्क्रीन पर दिखने वाले पिक्सल की संख्या रेस्योल्यूशन कहलाती है। स्क्रीन पर दिखने वाले ये छोटे डॉट्स (बिंदु) ही असल तस्वीर तैयार करते है। मौजूदा समय में ज्यादार लोग 1080/फुल एचडी और 4के रेस्योल्यूशन वाले टीवी पसंद करते है। हालांकि, इस वक्त 4के आसानी से नहीं मिलता। रेस्योल्यूशन कम होने के कारण कई लोग पांच से 10 साल में टीवी बदल लेते हैं। पर 1080 पी वाला टीवी इस मामले में ठीक रहता है।

4के और 1080 पी वाले रेस्योल्यूशन के बीच एचडी (720 पी) और फुल एचडी (एफएचडी) के बीच फर्क करना थोड़ा कठिन होता है, जबकि 50 इंच के टीवी में फुल एचडी सबसे बढ़िया साबित होता है। वहीं, 4के रेस्योल्यूशन वाला टीवी तब लेना चाहिए, जब आपके टीवी का आकार 50 इंच से अधिक हो।

कंपनियां आमतौर पर अपने टीवी में हाई कंट्रास्ट रेशियो होने का हवाला देती हैं। आप 1000:1 या 10000:1 सरीखी संख्या से कंट्रास्ट रेशियो से इसका अंदाजा भी लगा सकते हैं। पर सबसे बढ़िया तरीका स्टोर में जाकर चलते हुए टीवी को देखना होता है। सेल्समैन से टीवी दिखाने के दौरान उसे डेमो मोड से हटाकर चैनल या कुछ और दिखाने को कहें, ताकि आपको उसकी असल पिक्चर क्वालिटी के बारे में पता लग पाए। अच्छा रहेगा कि आप अपनी यूएसबी स्टिक में कुछ कंटेट लेकर जाए और उसे वहां टीवी पर चलवाकर देखें।

टीवी पर तस्वीर कितनी बार दिखाई गई, यह चीज रीफ्रेश रेट बताता है। फिल्म और वीडियो में मूविंग इमेज होती हैं। यानी उनमें रीफ्रेश रेट अधिक होता है। पर जरूरी नहीं कि हर बार यह बेहतर नतीजे ही दे। हालांकि, कई बार ये थोड़ा अटपटा भी लगता है। 60 हर्ट्ज के इफेक्टिव रीफ्रेश रेट वाला टीवी लेने से बचें। अगर टीवी गेमिंग के लिहाज से ले रहे हैं, तो 120 हर्ट्ज रीफ्रेश रेट वाला टीवी लीजिएगा।

ये भी जानें:

LED: लाइट एमिटिंग डायोड (एलईडी) टीवी में डिस्प्ले पैनल के पीछे एलईडी के अरै लगे होते हैं। स्क्रीन पर इसी की मदद से रोशनी पहुंचती है। आजकल सबसे अधिक यही टीवी प्रचलन में है।

OLED: इन टीवी में हर पिक्सल अपने आप में एलईडी होता है, जो कि लाल, हरे और नीले रंग में चमकता है। मौजूदा समय में इस प्रकार के टीवी सेट्स में सबसे अच्छे पैनल दिए जाते हैं।

QLED: इस तकनीक वाले टीवी में पैनल और एलईडी के बीच में नैनोक्रिस्टल लेयर दी जाती है। ऐसा रंगों की रेंज बढ़ाने के लिए किया जाता है।

लोकल डिमिंगः टीवी का ब्लैक लेवल बढ़ाने और उसे बेहतर बनाने के लिए इस डिमिंग का प्रयोग होता है। यह कंट्रास्ट को भी अच्छा बनाती है और इसे एक्टिव डिमिंग भी कहा जाता है।

HDR और डॉल्बी विजन: हाई डायनैमिक रेंज (एचडीआर) और डॉल्बी विजन को टीवी का कंट्रास्ट बढ़ाने के लिए दिया जाता है। मगर इसे इस्तेमाल करने के लिए यह जरूरी है कि कंटेंट एचडीआर पर शूट किया गया हो।

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