know how Identification of diseases can be due to the color of stool - मल के रंग से हो सकती है बीमारियों की पहचान, जानिए कैसे - Jansatta
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मल के रंग से हो सकती है बीमारियों की पहचान, जानिए कैसे

अगर आपके मल का रंग सफेद या मिट्टी के रंग से मिलता जुलता है तो यह डायरिया से पीड़ित होने का लक्षण हो सकता है। पित्त की कमी के चलते मल का रंग ऐसा होता है। पित्त शरीर में मेटाबोलिज्म ठीक रखने का काम करता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

मल का रंग से शरीर की अंदरूनी सेहत के बारे में कई बातें मालूम की जा सकती हैं। इससे शरीर में होने वाली बीमारी की पहचान कर सही समय पर उपचार हासिल किया जा सकता है। स्वस्थ और बीमार लोगों के मल में काफी अंतर होता है जिसे रंगों के आधार पर पहचाना जा सकता है। बता दें कि एक स्वस्थ व्यक्ति के मल का रंग गाढ़ा भूरा होता है। हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी डाइट कैसी है और इसमें पित्त की मात्रा कितनी है। दरअसल, आंतों से निकलने वाले मल का लगभग 75 प्रतिशत पानी होता है, बाकी मृत और जीवाणु दोनों होते हैं। इसके अलावा 65 साल से अधिक उम्र के लोगों को कब्ज होने का जोखिम सबसे ज्यादा होता है, इसलिए उन्हें अपने मल पर अधिक ध्यान देना चाहिए। आइए जानते हैं मल के रंग से बीमारियों की पहचान की कैसे जा सकती है।

सफेद या मिट्टी जैसा रंग: अगर आपके मल का रंग सफेद या मिट्टी के रंग से मिलता जुलता है तो यह डायरिया से पीड़ित होने का लक्षण हो सकता है। पित्त की कमी के चलते मल का रंग ऐसा होता है। पित्त शरीर में मेटाबोलिज्म ठीक रखने का काम करता है। अगर मेटाबोलिज्म ठीक नहीं होने पर शरीर में कई बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है, जैसे- हेपेटाइटिस, पित्त की पथरी, ट्यूमर या बिलेरी एट्रेसिया।

हरा रंग: कई बार हरी सब्जियां जैसे कि पालक, ब्रोकली, सरसों का साग का सेवन करने से मल का रंग हरा हो सकता है। इसके अलावा जब पित्त द्वारा भोजन को मेटाबोलाइज करने में वक्त लगता है तो भी मल का रंग बदल सकता है। हालांकि हरे रंग का मल आने पर चिंता करने की जरूरत नहीं होती, लेकिन जब आपने किसी हरी सब्जी या ऐसी चीज का सेवन न किया हो जिससे मल का रंग नजर आए तब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

पीला रंग: अकसर जिन लोगों को गेहूं, जौ, राई आदि चीजों से एलर्जी होती है उनके मल का रंग पीला हो सकता है। यह सेलियक रोग की वजह से होता है। आंतों की कार्यक्षमता के बदलाने से सेलियक की बीमारी होने का खतरा होता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना सही होता है।

काला रंग: अकसर आयरन या केओपेक्टेट, पेप्टो-बिस्मोल का सेवन करने पर मल का रंग काला हो सकता है, ऐसी स्थिति में घबराने की जरूरत नहीं होती। यह कुछ दिनों में सामान्य हो सकता है लेकिन ऐसा लंबे समय तक रहता है तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी होता है क्योंकि यह गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट में खून के रिसाव होने से भी हो सकता है। जिसका सही समय पर इलाज न होने से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी के होने का खतरा बढ़ जाता है।

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