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‘जल ही जीवन है’, लेकिन क्या RO के पानी पर भी यह बात लागू होती है? देखें VIDEO

कहते हैं... 'जल ही जीवन है', लेकिन क्या यह बात आरओ के पानी पर भी लागू होती है? आरओ यानी रिवर्स ऑस्मोसिस, सीधे शब्दों में कहें तो पानी को साफ करने की एक प्रक्रिया। आजकल ज्यादातर लोग आरओ के पानी पर निर्भर देखे जाते हैं। घर में आरओ नहीं लगा है तो बाहर से पानी की बोतल मंगा ली जाती है।

कहते हैं… ‘जल ही जीवन है’, लेकिन क्या यह बात आरओ के पानी पर भी लागू होती है? आरओ यानी रिवर्स ऑस्मोसिस, सीधे शब्दों में कहें तो पानी को साफ करने की एक प्रक्रिया। आजकल ज्यादातर लोग आरओ के पानी पर निर्भर देखे जाते हैं। घर में आरओ नहीं लगा है तो बाहर से पानी की बोतल मंगा ली जाती है। बड़े शहरों में यह बड़ी आम बात हो चुकी है। कहीं-कहीं घर में आरओ लगवाना स्टेटस सिंबल तक माना जाने लगा है। इसके अलावा कहीं आने-जाने, सफर करने के दौरान भी लोग बोतलबंद पानी पीना ही ज्यादा पसंद करते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आरओ वॉटर या प्लास्टिक की बोतल वाला पानी इंसान के लिए एकदम सेहतमंद होता है? दिन में कितनी बार, कितना पानी और कैसे पीना चाहिए? आज के बेहद आधुनिक जमाने में मिट्टी के घड़े का पानी कितना प्रासंगिक है, क्या वह आरओ के पानी के मुकाबले अपनी अहमियत रखता है? क्या बोतलबंद पानी को मिनरल वॉटर मानना चाहिए? पानी को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) की चेतावनी क्या है? ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब सोशल मीडिया पर चल रहे एक वीडियो में बखूबी मिल रहे हैं। इंटरनेट खंगालते वक्त हमारी नजर इस बेहद जरूर वीडियो पर पड़ी, जिसमें ड्रग डिस्कवरी साइंटिस्ट डॉक्टर विपिन गुप्ता बड़ी सहजता और सरलता के साथ पानी से जुड़ी बड़ी अहम जानकारियां दे रहे हैं।

वीडियो में दी गई जानकारी के मुताबिक पानी इंसान के शरीर का दो तिहाई हिस्सा और कैल्शियम और मैग्नीशियम समेत कई जरूरी मिनरल्स का श्रोत है। आरओ और बोतलबंद पानी में तीन बड़ी समस्याएं होती हैं- टीडीएस, मिनरल्स और प्लास्टिक्स। टीडीएस मतलब टोटल डिजॉल्व सॉलिड.. मतलब पानी में क्या क्या घुला है और कितना घुला है।

टीडीएस कम होने पर पानी हाइपो टॉनिक होता है, ज्यादा होने पर हाइपर टॉनिक। पीने के पानी को न तो बहुत ज्यादा हाइपो टॉनिक होना चाहिए और न ही हाइपर टॉनिक। सबसे अच्छी टोनेसिटी 350 टीडीएस पर मिलती है। पानी का टीडीएस सौ से कम नहीं होना चाहिए। सौ से कम टीडीएस का पानी बहुत ज्यादा हाइपो टॉनिक होता है, इससे बॉडी का बैलेंस मियोस्टेसिस गड़बड़ा जाता है। इसके गड़बड़ होने से कई बीमारियां होती है, जैसे कि कार्डियो वैस्कुलर डिसीज से लेकर बालों के झड़ने तक। अमूमन आरो और बोतल वाला पानी पीने वाले 99 फीसदी लोग 100 से नीचे वाले टीडीएस का पानी पी रहे हैं, ऐसे वे स्वाद के चक्कर में करते हैं, क्योंकि 65 से 75 के बीच में पानी का स्वाद सबसे मीठा होता है।

आरओ मेबरेन से पानी फिल्टर होने पर ढेर सारे मिनरल्स निकल जाते हैं। पानी के 90 फीसदी मिनरल्स कम हो जाते हैं। मजे की बात यह है कि बोतलबंद पानी को आमतौर पर मिनरल वॉटर कहा जाता है। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। उसमें मिनरल बहुत कम होते हैं। लीगल मामला होने पर ब्रैंडेड पानी बनाने वालों ने मिनरल वॉटर लिखने की जगह पैकेज्ड वॉटर लिखना शुरू कर दिया।

आरो मेबरेन से पानी फिल्टर होने पर काफी प्लास्टिक उसमें घुलता है। बोतल में भी कई हफ्ते और महीनों पानी रखा रहने पर प्लास्टिक घुलता है। ऐसा इसलिए होता क्योंकि 100 से कम के टीडीएस का पानी बहुत ज्यादा अग्रेसिव यानी हाइपो टॉनिक होता है, जो कि कई चीजों को घोलता है। पानी में घुलने वाला यह प्लास्टिक कैंसर समेत कई बीमारियां का कारण बनता है।

क्या करें?

बोतलबंद पानी नजरअंदाज करें। घर के पानी का टीडीएस चेक करें, अगर टीडीएस 900 से ज्यादा है तो आरओ लगा लें। आरओ के आउटपुट का टीडीएस 350 रखें। 900 से कम टीडीएस पर आरओ लगाना समझदारी नहीं है।

मिट्टी के घड़े का पानी अमृत

पानी को मिट्टी के घड़े में रखें। घड़ा ऐसी जगह रखें जहां धूप और हवा आती हो। पानी का टीडीएस ज्यादा होने पर घड़ा थोड़े मिनरल्स निकाल लेता है और टीडीएस कम होने पर उसमें मिनरल्स जोड़ देता है। धूप और हवा में घड़ा रखने से पानी अच्छी तरह से ऑक्सीजनेट और सेनेटाइज हो जाता है।

कितना पानी पिएं, कब पिएं और कैसे पिएं?

रोज ढाई लीटर पानी पीना चाहिए। इससे कम पानी पीने पर कई समस्याएं होती हैं, पहली समस्या यह कि बॉडी पानी को रीटेन कर लेती है। रिटेन करने से वजन तो बढ़ने के अलावा कई समस्याएं होती हैं। किडनी स्टोन यानी पथरी हो सकती है, कॉन्सटिपेशन भी हो सकता है। थोड़ा-थोड़ा करके पानी नहीं पीना चाहिए। एकबार में कम से कम दो गिलास पानी पिएं। खाना खाते वक्त पानी न पिएं। बोतलबंद पानी को आदत न बनाकर हर जगह का पानी पीना चाहिए। इससे शरीर की क्षमता बढ़ेगी।

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