रानी कमलापति ने भोपाल लेक से कूद कर दे दी थी जान: जानें- कौन थीं निजाम शाह की विधवा, जिनके नाम पर रखा गया हबीबगंज स्टेशन का नाम?

सीएम शिवराज सिंह ने दावा किया कि कमलापति “भोपाल की अंतिम हिंदू रानी” थीं, जिन्होंने जल प्रबंधन के क्षेत्र में महान काम किया और पार्क और मंदिर स्थापित किए।

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भोपाल में इस स्टेशन को पीपीपी मोड के अंतर्गत रीडेवलप किया गया है। (फोटो सोर्स: टि्वटर/@M_Lekhi)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (15 नवंबर, 2021) दोपहर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पुनर्विकसित रानी कमलापति रेलवे स्टेशन का उद्घाटन किया। पहले तक इस स्टेशन को हबीबगंज स्टेशन के नाम से जाना जाता था, जिसे हाल ही में नई पहचान मिली है

यह स्टेशन पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड के तहत तैयार किया गया है। खास बात है कि यह सूबे का पहला विश्व स्तरीय रेलवे स्टेशन है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली प्रदेश की बीजेपी सरकार के मुताबिक, यह नामकरण गोंड समुदाय की रानी की याद और बलिदान का सम्मान करने के लिए है।

आइए जानते हैं कि रानी कमलापति कौन थीं, जिनके नाम पर इस स्टेशन का नाम रखा गया है: रानी कमलापति निजाम शाह की विधवा थीं, जिनके गोंड वंश ने 18वीं शताब्दी में भोपाल से 55 किलोमीटर दूर तत्कालीन गिन्नौरगढ़ पर शासन किया था। निजाम शाह ने भोपाल में अपने नाम पर मशहूर सात मंजिलों वाला कमलापति पैलेस बनवाया था।

शहर में लगाई गई रानी कमलापति की याद में उनकी आदमकद भव्य प्रतिमा। (फोटो सोर्स: facebook.com/mybhopal)

वह सीहोर में सल्कानपुर के राजा कृपाल सिंह की बेटी थीं। वह अपनी बुद्धिमत्ता और बहादुरी के लिए जानी जाती थीं। बताया जाता है कि वह घुड़सवारी में माहिर थीं। उन्हें इसके अलावा निशाना लगाना और पहलवानी/कुश्ती करना भी आता था।

एक हुनरमंद सेनापति के नाते उन्होंने अपने पिता और अपनी महिला सेना के साथ आक्रमणकारियों से अपने साम्राज्य को बचाने के लिए जंग लड़ी थी। उन्होंने भोपाल लेक से कूदकर खुदकशी कर ली थी। साल 1723 में उनके निधन के बाद भोपाल में नवाबों का शासन आ गया था, जिसका नेतृत्व दोस्त मोहम्मद खान ने किया था।

राज्य सरकार के अनुसार, कमलापति को पति की हत्या के बाद अपने शासनकाल के दौरान हमलावरों का सामना करने में बड़ी बहादुरी दिखाने के लिए जाना जाता है। सीएम शिवराज सिंह ने दावा किया कि कमलापति “भोपाल की अंतिम हिंदू रानी” थीं, जिन्होंने जल प्रबंधन के क्षेत्र में महान काम किया और पार्क और मंदिर स्थापित किए।

चौहान ने अपने ब्लॉग में रानी के बारे में लिखा, “गोंड रानी कमलापति आज भी प्रासंगिक हैं। 300 साल हो चुके हैं और हम उनके बलिदान के लिए उन्हें सम्मानित करने में सक्षम होने के लिए आभारी हैं। भोपाल का हर हिस्सा उनकी कहानी को बयान करता है। उनके बलिदान की गूंज यहां की झील के पानी में आज भी सुनी जा सकती है।”

गोंड, भारत के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक हैं। ये लोग मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार और ओडिशा में फैले हुए हैं। 19वीं सदी के प्रतिष्ठित आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को नामित और पुनर्विकसित रेलवे स्टेशन का उद्घाटन किया गया।

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