ईंधन पर बेतहाशा बढ़ता गया टैक्स! वरना आज भी 66 रुपए प्रति लीटर होता पेट्रोल और 55 रुपए प्रति लीटर बिकता डीजल

2014 में कच्चे तेल (पेट्रोलियम) का दाम 6358 रुपए प्रति बैरल था, जबकि जनवरी 2021 में यह 3,918.56 रुपए प्रति बैरल और अगस्त 2021 में 5,108.73 प्रति बैरल था।

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पेट्रोल-डीजल के दाम में वृद्धि को लेकर 18 अक्टूबर को कांग्रेस ने मोदी सरकार पर कटाक्ष किया। कहा कि कीमतें इस कदर बढ़ीं कि अब हवाई चप्पल वालों का भी सड़क पर सफर करना मुश्किल हो गया है। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः गणेश श्रीशेखर)

ईंधन के दाम बीते कुछ वक्त से बढ़े ही हैं। वजह- टैक्स में इजाफा है। अगर पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले कर में बढ़ोतरी न हुई होती, तब यह अभी भी क्रमशः 66 रुपए और 55 रुपए में मिल जाते। दरअसल, पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार ने पेट्रोल व डीजल पर काफी टैक्स बढ़ाया। उदाहरण के तौर पर साल 2014 में ऑइल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) ने डीलर्स को 49 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से पेट्रोल बेचा था। डीलर मार्जिन और केंद्रीय व राज्य स्तर के कर के बाद इसकी रीटेल कीमत बढ़कर 74 रुपए प्रति लीटर हो गई।

ऐसे में ओएमसी को अंतिम मूल्य का 66 फीसदी हिस्सा मिला, जबकि 34 प्रतिशत हिस्सा डीलर्स, केंद्र और राज्य सरकारों के पास गया। अब ओएमसी का शेयर गिरकर 42 फीसदी हो गया है, जबकि डीलर कमीशन और टैक्स बढ़कर 58 प्रतिशत पर आ गया है। सर्वाधिक बढ़ोतरी केंद्रीय करों में हुई, जो कि 2014 में रीटेल प्राइस (खुदरा मूल्य) के 14 प्रतिशत से बढ़कर अब 32 प्रतिशत हो गया है। इसी समयकाल में राज्य सरकार का शेयर भी बढ़कर 17 फीसदी से 23 प्रतिशत हो गया। ऐसे में अगर टैक्स की दरें 2014 के स्तर पर होती तो अभी भी पेट्रोल का दाम 100+ के बजाय 66 रुपए के आस-पास होता।

कोरोना और महंगाई की दोहरी मार के बीच तेल के आसमान छूते दाम ने आम आदमी को छकाया, पर केंद्र के लिए यह बोनांजा के रूप में बनकर उभरा। ऐसा इसलिए, क्योंकि पेट्रोल और डीजल पर अधिक टैक्स की वजह से केंद्र की खूब कमाई हुई। केंद्र के टैक्स कलेक्शन (कर संग्रह) में 164 फीसदी का इजाफा हुआ। यह रकम 2014-15 में 1.7 लाख करोड़ रुपए थी, जो कि 2020-21 में बढ़कर 4.6 लाख करोड़ जा पहुंची। राज्यों का संग्रह भी साल 2017-18 से (जब उन्होंने दो लाख करोड़ का आंकड़ा पार किया था) कम या ज्यादा स्थिर ही रहा।

‘तेल की ऊंचे दाम वैश्विक आर्थिक पुनरुद्धार को पहुंचाएंगे नुकसान’: इसी बीच, दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता भारत ने सऊदी अरब और ओपेक (तेल निर्यातक देशों के संगठन) के अन्य सदस्य देशों से कहा है कि तेल की ऊंची कीमतें दुनिया में आर्थिक पुनरुद्धार को नुकसान पहुंचाएंगी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को कहा कि ओपेक को तेल की कीमतें वाजिब स्तर पर रखनी चाहिए। बता दें कि इस साल मई से कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी शुरू होने के बाद देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं, जबकि भारत पश्चिम एशिया से अपनी तेल जरूरतों का लगभग दो-तिहाई आयात करता है।

(फोटो + डेटा सोर्सः statista.com)

कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा: कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने तेल की कीमतों में वृद्धि को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार पर कटाक्ष किया। कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों के दाम इस कदर बढ़ा दिए गए हैं कि अब हवाई चप्पल वालों और मध्यम वर्ग के लोगों का सड़क पर सफर करना भी मुश्किल हो गया है। बता दें कि साल 2014 में कच्चे तेल (पेट्रोलियम) का दाम 6358 रुपए प्रति बैरल था, जबकि जनवरी 2021 में यह 3,918.56 रुपए प्रति बैरल और अगस्त 2021 में 5,108.73 प्रति बैरल था।

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