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ब्‍लॉग: सनी लियोनी और भारतीय समाज का पाखंड

जो समाज एक पूर्व पोर्न स्टार को सम्मानित कलाकार के रूप में स्वीकार कर सकता है, वह अपने ही समाज की लड़कियों के साथ हो रही ज्‍यादतियों को लेकर उदासीन कैसे रह सकता है? उस समाज में बलात्कार की शिकार लड़कियों को मुंह छिपाने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए?

बॉलीवुड एक्ट्रेस सनी लियोनी

श्रीनिवास

इस लेख और विषय की प्रेरणा फेसबुक के एक पोस्ट से मिली। किसी मित्र द्वारा शेयर किए गए किसी और के पोस्ट में कोई युवती एक पोस्टर लिए खड़ी थी। उस पर लिखा था- ‘इस देश में एक पोर्न स्टार को तो सेलेब्रिटी की हैसियत मिल सकती है, मगर एक दुष्कर्म पीडि़ता को चेहरा और पहचान छिपाकर जीना पड़ता है!’ भारतीय समाज के पाखंड पर एक कठोर टिपण्णी भी।

जाहिर है, इशारा सनी लियोनी नाम की उस अभिनेत्री की ओर था, जो कभी पोर्न फिल्मों में काम करती थी और आज हिंदी फिल्मों में बतौर नायिका काम कर रही है। अन्य किसी फिल्‍मी नायिका को मैं नहीं जानता, जिसका ऐसा अतीत रहा हो। वैसे आजकल पोर्न फिल्म को ‘एडल्ट’ फिल्म कहने का भी चलन है। हालांकि, एडल्ट फिल्म वह होती है, जिसे सेंसर बोर्ड ‘ए’ सर्टिफिकेट देता है; और जिसे सिर्फ वयस्क देख सकते हैं। पोर्न में स्त्री-पुरुष सहवास का खुला फिल्मांकन होता है। भारत में इस तरह की फिल्‍मों पर पूर्ण प्रतिबन्ध है। यह बात और है कि बाजार में ये हमेशा से उपलब्ध रही हैं। अब तो इंटरनेट पर लाखों ऐसी साइटें हैं, जिन पर ऐसी ही फ़िल्में दिखाई जाती हैं।

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अब तक सनी पर ‘एडल्ट स्टार’ का ठप्पा लगा हुआ है; उन्‍हें फिल्मों में भी देह दिखाऊ और कामुकता परोसनेवाले किरदार ही मिल रहे हैं। फिर भी पोर्न फिल्मों में काम कर चुकी एक युवती, जिसके पुराने सेक्स वीडियोज आज भी नेट पर उपलब्ध हैं, को यदि भारतीय फिल्मों में कलाकार की हैसियत मिल गयी है, तो यह बड़ी बात है। कमाल की बात यह भी है कि आए दिन इस या उस फिल्म पर अश्लीलता को बढ़ावा देने वाले भारतीय संष्कृति के स्वयंभू संरक्षकों ने भी लियोनी को यह हैसियत या प्रतिष्ठा मिलने पर या उनकी किसी फिल्म पर आपत्ति नहीं की है।

बहरहाल, मुझे सनी से कोई शिकायत नहीं है। न ही हिंदी फिल्मोद्योग द्वारा उन्हें बाइज्जत एक अभिनेत्री और नायिका के रूप में स्वीकार किए जाने से कोई कष्ट है। देश के फिल्मी दर्शकों ने भी यदि ‘सचमुच’ लियोनी को स्वीकार कर लिया है, तो इसे भारतीय समाज में आते सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है लेकिन…। यह ‘लेकिन’ बहुत बड़ा है और ‘सचमुच’ की शर्त से जुड़ा है। यह संदेह बरकरार है कि शायद लियोनी की स्वीकार्यता वास्तविक नहीं है। संदेह इसलिए क्‍योंकि जो समाज एक पूर्व पोर्न स्टार को सम्मानित कलाकार के रूप में स्वीकार कर सकता है, वह अपने ही समाज की लड़कियों के साथ हो रही ज्‍यादतियों को लेकर उदासीन कैसे रह सकता है? उस समाज में बलात्कार की शिकार लड़कियों को मुंह छिपाने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए?

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Sunny

ऐसे में लगता यही है कि आम फिल्म दर्शकों के लिए सन्नी लियोनी अब भी एक कामोत्तेजक सेक्स सिंबल ही हैं। शायद ही किसी परिवार के सभी सदस्य सन्नी लियोनी की कोई फिल्म मिलबैठ कर देखते हों या उस पर चर्चा भी करते हों। हालांकि, बाजार, उपभोक्तावाद और फिल्मी आयटम गीतों का जलवा ऐसा है कि घोर ‘संस्कारी’ घरों के बच्चे भी पारिवारिक समारोहों में सन्नी लियोनी सहित तमाम सभी हीरोइनों के आयटम गीतों पर कमर हिलाते हैं और बड़े तालियां भी बजाते हैं। वहीं, आम लड़कियों पर तरह-तरह की पाबंदियों का सिलसिला बदस्तूर जारी है। दरअसल, अनेक मामलों की तरह इस मामले में यानी स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर हमारा आचरण और सोच पाखण्ड से भरा है।

सच तो यही है कि समाज में आज भी महिलाओं को वह बराबरी और सम्मान हासिल नहीं है, जिसका हम गर्व से दावा करते हैं। सड़क से लेकर कार्यस्थलों में, यहां तक कि घरों के अन्दर भी वे पूरी तरह महफूज नहीं हैं। तभी तो बलात्कारी शान से सर उठाए घूमते हैं; और उसकी हैवानियत की शिकार को जिल्लत की जिन्दगी जीनी पड़ती है। तभी तो वास्तव में बलात्कार की जितनी घटनाएं घटती हैं, उनमें से कई के बारे में कोई जान ही नहीं पाता। इसलिए कि कई बार तो खुद लड़की शर्म और भय के मारे किसी को नहीं बताती; और कई बार उसका परिवार ही चुप लगा जाता है, ताकि लड़की की बदनामी न हो। सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश दे दिया कि दुष्कर्म पीडिता की पहचान उजागर न की जाए।

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2012 के दिसंबर में दिल्ली में हुए सामूहिक रेप की घटना को याद कीजिए। आज भी आम लोग उस बहादुर युवती को ‘निर्भया’ और उस मामले को ‘निर्भया रेप केस’ के नाम से जानते हैं। धन्य हैं उसके माता-पिता, जिन्होंने खुद उसका नाम सार्वजनिक कर दिया। 18 अप्रैल को लखनऊ के ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 11 साल पहले हुए ‘आशियाना रेप केस’ के एक अभियुक्त गौरव शुक्ला को दस साल की सजा सुनाई है। वारदात के वक्‍त पीडि़त लड़की की उम्र महज 13 साल थी। अब वह 24 साल की वयस्क युवती है; और बिना किसी हिचक के अपनी आपबीती सुनती है। 13 अप्रैल को जब अदालत ने गौरव को दोषी घोषित किया, तब वह कोर्ट में फैसला सुनने का इंतजार कर रही थी। फैसला आने के बाद वह खुले चेहरे में कोर्ट में मौजूद लोगों और पूरी दुनिया को बताना चाहती थी कि उसके साथ जो कुछ हुआ, उसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। वह बलात्कार पीडिता नहीं, एक बहादुर और जुझारू लड़की है। वह अपने साथ हुए इस जघन्‍य अपराध को लेकर जरा सा भी शर्मिंदा नहीं है।

क्या समाज उसके इस जज्बे और उसकी इस बहादुरी का सम्मान करेगा? क्या वह दिन जल्द आएगा, जब हम लियोनी को वास्‍तविक तौर पर सम्‍मान देंगे और कोई दुष्कर्म पीडि़त भी सम्मान के साथ जी सकेगी? जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक वह पोस्टर हमें मुंह चिढ़ाता रहेगा।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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