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BLOG: बिहार में हार पर दिनेश त्रिवेदी ने नरेंद्र मोदी को दीं चार सीख

भारत की मूल भावना की जीत हुई है। भाजपा के लिए यह चिंतन बैठक का वक्‍त है। मैं जब यह लिख रहा हूं तो वोटों की गिनती चल ही रही है।

Author नई दिल्ली | November 18, 2015 11:38 AM

भारत की मूल भावना की जीत हुई है। भाजपा के लिए यह चिंतन बैठक का वक्‍त है। मैं जब यह लिख रहा हूं तो वोटों की गिनती चल ही रही है। पर यह तय हो चुका है कि असल में बिहार किसने जीता है और क्‍यों? जहां तक मेरा मानना है, इस देश की मूल भावना की जीत हुई है।

बुद्धू बक्‍से पर तथाकथित राजनीतिक पंडित जाति, मत, धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण जैसी जो दलीलें दे रहे हैं, उन्‍हें सुन कर हैरानी हो रही है। वे भारत की जमीनी हकीकत से अनजान हैं। जी हां, मैं इस चुनाव में भारतीय मानस की जीत देख रहा हूं। वह मानस, जो हमेशा सुधार के हक में रहा है। हम सब को इस चुनाव से सबक लेने की जरूरत है।

सबक नंबर 1: राजनीति में कोई हमेशा सुपरमैन नहीं बना रह सकता। लोग आते हैं, चले जाते हैं।

सबक नंबर 2: आम भारतीयों का दिमाग टेलीविजन पर आने वाले तमाम चुनाव विशेषज्ञों, विश्‍लेषकों और कथित पंडितों के दिमाग से कहीं ज्‍यादा तेज है।

सबक नंबर 3: जाति-धर्म आदि एक सच तो है, पर इनके आधार पर चुनाव जीतने के लिए भारतीयों को बरगलाया नहीं जा सकता।

सबक नंबर 4: चुनाव से ऐन पहले वित्‍तीय पैकेज का चारा फेंक कर मतदाताओं को नहीं लुभाया जा सकता। इसका उल्‍टा असर पड़ता है।

19 अक्‍टूबर को यहीं लिखे ब्‍लॉग में मैंने कहा था, ‘मोदी ने इस चुनाव को पार्टी के बजाय अपने ऊपर रायशुमारी के तौर पर लेकर रणनीतिक भूल की है।’ मैंने ये भी लिखा था, ‘अगर मोदी बिहार चुनाव हार जाते हैं तो भाजपा और सरकार पर उनकी पकड़ काफी हद तक ढीली पड़ेगी। भाजपा के अंदर और सहयोगी पार्टियों से भी उनके खिलाफ तलवारें निकलने लगेंगी और इससे देश की राजनीति में भी बदलाव होगा।’ वर्ष 2019 तक नीतीश प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के रूप में उभर सकते हैं। ये सब होगा।

दिल्‍ली विधानसभा चुनाव के बाद यह भाजपा और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी को दूसरा बड़ा झटका है। इन चेहरों की नाकामी का नतीजा भाजपा के कार्यकर्ताओं और खुद इन दोनों नेताओं के आत्‍मविश्‍वास में कमी के रूप में दिखेगा। भाजपा/नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव को खामख्‍वाह नाक का सवाल बना लिया था। इस पर दुनिया भर की नजर भी थी। आज दुनिया भारत पर करीब से नजर रख रही है। यह बहुत बड़ा बाजार है और यहां आर्थिक रूप से उनकी दिलचस्‍पी है। इसके अलावा दुनिया यह भी देखना चाहती है कि भारत का लोकतंत्र किस तरह काम कर रहा है।

हमें हमारे धार्मिक ग्रंथों से यह सीख लेनी चाहिए कि अहंकार के चलते दुर्योधन, कंश और रावण जैसे महारथियों का भी विनाश हो जाता है। जंग और चुनाव सिपाहियों की बदौलत लड़े जाते हैं। जनरल का रोल सिर्फ उन्‍हें प्रोत्‍साहित करना और नीतियां बनाने का होता है। अफसोस की बात है कि आज मोदी के पास टीम नहीं है। उन्‍हें जितनी जल्‍दी ये बात समझ में आ जाए कि उनके शुभचिंतक ही उन्‍हें उनकी गलतियां और कमजोरियां बता सकते हैं, उनके लिए उतना ही फायदेमंद होगा। चापलूस लोग कभी नहीं बताएंगे कि राजा की इज्‍जत नीलाम हो रही है।

बिहार चुनाव नतीजों के चलते मई 2014 के बाद की भारतीय राजनीति में सुधार होगा। भाजपा का महाफायदा बिहार में महागठबंधन ने छीन लिया। सतही चीजों से मनचाहे नतीजे नहीं मिल सकते। अगर मोदी की टीम में सतही लोग होंगे तो काम नहीं चलेगा। अगर वह चाहते हैं कि सुधार किया जाए तो सबसे पहले उन्‍हें अपने मंत्रिमंडल में काबिल लोगों को लाना होगा। चाहे वह भाजपा के हों या बाहर के। आरएसएस को भी देश की प्राथमिकताएं समझने की जरूरत है। भारतीय मानस ‘वसुधैव कुटुंबकम’ में यकीन रखता है। भाजपा ने इसे नहीं समझा और उसकी हार हुई।

बीच चुनाव में उसने अपनी रणनीति बदल ली और विकास, शिक्षा, सेहत से बदल कर जाति, धर्म, संप्रदाय को एजेंडा बना लिया। नीतीश अपने एजेंडे पर कायम रहे। टीम मोदी की ओर से काफी आक्रामकता दिखाई गई, लेकिन आत्‍मविश्‍वास और समर्पण की कमी रही। बिहारी बनाम बाहरी के मुद्दे ने भाजपा के लिए ताबूत में आखिरी कील का काम किया। बार-बार जंगलराज का जुमला उछालने से बिहार की अस्मिता (जैसे मोदी हमेशा गुजरात की अस्मिता की बात करते हैं) चोटिल हुई। भाजपा प्रवक्‍ताओं ने टीवी चैनलों पर भी खूब जहर उगला। सहिष्‍णुता बनाम असहिष्‍णुता की लड़ाई खुले आम लड़ी गई।

यह बात समझ लीजिए कि भारत में आम आदमी की चाहत बड़ी मामूली है। उसे शांति, सुरक्षा, कानून का राज और सही कीमत पर दाल/चावल चाहिए। इन सबके सामने वित्‍तीय पैकेज का महत्‍व कुछ भी नहीं है। पैकेज को वह खाने के तौर पर इस्‍तेमाल नहीं कर सकता। अभी सिलसिला जारी रहेगा। भारतीय लोकतंत्र और मजबूत बन कर उभरा है। मुझे उम्‍मीद है कि भाजपा सम्‍मानपूर्वक इस हार को स्‍वीकार करेगी। यह उसके लिए आत्‍ममंथन, चिंतन बैठक का वक्‍त है!

(लेखक पूर्व रेल मंत्री हैं।)

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