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बेबाक बोलः नायकार्जुन

अर्जुन महाभारत के आधिकारिक नायक हैं। कृष्ण गीता का उपदेश देने के लिए उन्हें ही चुनते हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन की मनुष्यता, देवता से टकराती है। देवता उनके मनुष्य रूप की कमियों, सीमाओं, संभावनाओं को जगाते हैं ताकि धर्म की रक्षा हो सके। महाभारत को धर्मयुद्ध की तरह देखा जा रहा था तो अर्जुन धर्म की रक्षा के लिए हाथ जोड़ कर सारी बात मानने के बजाए हथियार रख कर प्रतिरोध भी करते हैं। अपनी तरफ से वो हमेशा धर्म की ओर खड़े होते हैं। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर पौराणिक इतिहास के उन चुनिंदा नायकों में हैं जिसने पुरुषत्व के साथ नपुंसकत्व की भी भूमिका चुनी, जहां वे नृत्य कला और साहित्य के मर्मज्ञ के रूप में मनुष्यता का कोमल और सबल पक्ष रखते हैं। सत्ता की ताकत के साथ धैर्य और विवेक को धारण करने वाले ही नायक का दर्जा पाते हैं। बेबाक बोल में अर्जुन।

स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी अर्जुन पर मोहित होती है तो अर्जुन मां का स्वरूप मान कर उसके अनुरोध को खारिज कर देते हैं।

भारत में सबसे ज्यादा पूजी जाती है रामायण लेकिन यथार्थ में सबसे ज्यादा उतरती है महाभारत। महाभारत भारत के सांस्कृतिक इतिहास का सबसे अहम हिस्सा है। इतिहास यानी कि अतीत से वर्तमान का निरंतर संवाद। नेत्रहीन धृतराष्ट्र संजय से जानना चाहते हैं कि पहला वार कौरवों ने तो नहीं किया। धृतराष्ट्र को युद्ध के परिणाम से ज्यादा इतिहास की चिंता है कि आगे का समय उन्हें कैसे देखेगा। उन्हें इतिहास में सम्मानित श्रेणी में ही रखे जाने की इच्छा है। संजय कुरु नरेश के आंकड़ों पर ध्यान दिलाते हैं कि संयम और विवेक को परे रखने के कारण उन्हें किस रूप में देखा जाएगा। इसके साथ ही कुरुक्षेत्र के मैदान में इतिहास के लिए नायक का निर्माण शुरू हो जाता है। यहां पर इतिहास खुद इतिहास बनने का पाठ पढ़ रहा था। कैसे तैयार होता है इतिहास का नायक?

गीता के उपदेश में है नायक का गढ़न। सूत्रधार कृष्ण के जरिए महाभारत के आधिकारिक नायक घोषित होते हैं अर्जुन। आधिकारिक इसलिए कि गीता का उपदेश देने के लिए कृष्ण अर्जुन को चुनते हैं। हर काल क्षेत्र का एक ऐतिहासिक उत्पाद तैयार होता है तो महाभारत का वो केंद्रीय उत्पाद है श्रीमद्भगवदगीता। गीता सार का जरिया बनने वाले अर्जुन ही आज नायकों के प्रतीक के रूप में आधुनिक घरों की बैठकी की दीवारों पर सज्जित होते हैं। आज के संदर्भ में इतिहास और नायकत्व को समझने के लिए अर्जुन को समझना जरूरी हो जाता है? महाभारत के अन्य पात्रों कर्ण, द्रौपदी और कुंती की तुलना में अर्जुन का पुनर्पाठ कम ही हुआ है। इसकी वजह है कृष्ण द्वारा अर्जुन को आधिकारिक नायकत्व का दर्जा देना।

आम घरों में आज भी यह सवाल उठता है कि अर्जुन को नायक का दर्जा कैसे दें जबकि उसकी वीरता की शुरुआत होती है छल से। कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू हुए दस दिन बीत जाते हैं और पांडवों को महसूस हो जाता है कि भीष्म पितामह के होते उनकी जीत तय नहीं है। इसके लिए कृष्ण की सलाह से अर्जुन छल करते हैं और अपने रथ पर शिखंडी को रखते हैं। कर्ण जैसे योद्धा की हत्या भी अर्जुन के शौर्य नहीं अपने बेटे के लिए इंद्र के किए गए छल और शल्य के कारण होती है। तो जहां छल से मारा गया कर्ण और शिखंडी की आड़ में शरशय्या पर भेजे गए भीष्म हैं, वहां एक आम नजर अर्जुन को सबसे बड़े योद्धा के रूप में देखने से इनकार करे, यह लाजिम है। इसी नजर को व्यापक करने के लिए जरूरत होती है इतिहास की क्योंकि इतिहास व्यक्ति को काल और समाज के सापेक्ष रख कर देखता है। इतिहास आज और अभी का नहीं हजारों साल के आगे और पीछे का होता है। आज सैकड़ों साल बाद भी महाभारत हमें हर घर, समाज और देश में घटित होती दिखती है तो इसलिए क्योंकि इसमें इतिहास के सबक हैं। महाभारत इस सत्य का सामना करवाता है कि नायक की मनुष्यता को दैवीय मूल्यों से टकराना होता है। सफेद और काले रंंग के भी आज जब कई विमर्श हैं तो हम अर्जुन को भी उसी धूसर रंग में देखेंगे जो इतिहास को स्वीकार्य है।

गीता का मूल सवाल यही है कि मैं क्या हूं। पूरी महाभारत में ‘मैं’ से सबसे ज्यादा ग्रसित अर्जुन ही है। राजकुल के वरिष्ठों का आज्ञाकारी और महान धनुर्धर के रूप में परिभाषित। उसके ‘मैं’ की पराकाष्ठा है कि वह हथियार रख देता है और अपने दायित्व से मुंह मोड़ लेता है। अर्जुन को लगता है कि उसके हथियार डाल देने से युद्ध टल जाएगा। यहीं पर कृष्ण जीव और जगत की दार्शनिक व्याख्या करते हैं। यहां जगत का मध्यकालीन बोध सामने आता है। इस जगत को ईश्वर ने रचा है, और सब कुछ नश्वर है। गीता में मृत्यु को जीवन और ‘मैं’ से जोड़ने की दार्शनिक व्याख्या है। कृष्ण जैव जगत के एक सदस्य के रूप में अर्जुन को उसकी तुच्छता का अहसास करवाते हैं। नश्वर ‘मैं’ के सामने अनश्वर ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। अर्जुन की तुच्छता का बोध करवा उसके ‘मैं’ का विसर्जन करवाते हैं। आज के संदर्भ में अर्जुन की व्याख्या अहम हो जाती है जब नायकत्व को हर खांचे की पड़ताल से गुजरना पड़ता है।

अर्जुन इंद्र का बेटा और कृष्ण का सखा है। मनुष्य है लेकिन देवताओं का प्रिय है। वह बलशाली होने के साथ बुद्धिमान और गुणी भी है। इसके साथ जो सबसे अहम चीज उभर कर आती है वो है धैर्य। ताकत के साथ नियंत्रण आता है तभी आप नायक बनते हैं। बुद्धि और विवेक के बिना खालिस मर्दानगी वाली ताकत तो महाभारत के कई चरित्रों में है। लेकिन धैर्य और विवेक का धारण अर्जुन ही करते हैं। अर्जुन अगर भीष्म पर विजय पाने के लिए शिखंडी का सहारा लेने की कृष्ण की सलाह मानते हैं तो इसमें भी एक इतिहास बोध है। आज जब विमर्श में जेंडर का औजार सबसे धारदार है और मानव अस्तित्व स्त्री और पुरुष के खांचे से निकल अन्य पहचानों में मुखर है तो हम पौरुष के साथ नपुंसकता के रूप को भी देखते हैं। वृहनल्ला के रूप में अर्जुन से नायकत्व कहीं दूर नहीं जाता लेकिन मनुष्यता और नजदीक आती है।

स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी अर्जुन पर मोहित होती है तो अर्जुन मां का स्वरूप मान कर उसके अनुरोध को खारिज कर देते हैं। उर्वशी को लगता है कि अर्जुन ने उसके रूप और गुण का अपमान किया है तो उसे शाप दे देती है जिसे अर्जुन सहर्ष स्वीकार करता है। ऐसा नायक जो एक तरफ वीर और दूसरी तरफ नपुंसकता का भी रूप है। इस कारण वह कला और संगीत का मर्मज्ञ बनता है जो उसे ज्यादा विवेकवान बनाता है। अर्जुन का विवेक और धैर्य खास कर तब दिखता है जब द्रौपदी को जीत कर आता है। जीत उसकी है लेकिन जब मां का आदेश मान द्रौपदी के पांचों पांडव से विवाह की बात आती है तो वह धैर्य नहीं खोता है। द्रौपदी के चीर-हरण के वक्त भीम तो धैर्य खो देता है लेकिन अर्जुन वहां भी संयम बरतने में कामयाब होता है। ताकत और सत्ता का गठजोड़ धैर्य और विवेक के साथ होता है तो कैसे वह विशिष्ट होता है इसका उदाहरण अर्जुन है। इसी विशिष्टता का परिणाम है कि अपने पुत्र अभिमन्यु की हत्या के बाद भी अर्जुन गुरु पुत्र अश्वत्थामा की हत्या नहीं करता है। ये नैतिक मूल्य ऐसे नायक की निर्मिति करते हैं जो देवताओं को भी प्रिय है। युद्ध के समय मनुष्य की भांति व्यवहार कर वह मनुष्यता के मानदंड को ही ऊंचा करता है।

महाभारत प्रतीक है धर्मयुद्ध का और अर्जुन हर बिंदु पर धर्म के साथ खड़ा दिखाई देता है। वह धर्म की रक्षा के लिए प्रतिरोध करता है। उसे अपने भाइयों की हत्या में धर्म नहीं दिखाई देता है तो अपने शस्त्र रख देता है। भीष्म को हराने के लिए शिखंडी की आड़ लेने के कृष्ण के प्रस्ताव पर भी आपत्ति करता है। भीष्म जब शरशय्या पर पड़े हैं तो अर्जुन जाकर उनसे माफी मांगता है कि मैंने इतने कायराना तरीके से आप पर वार किया। कर्ण के रथ का पहिया जब जमीन में धंस जाता है तो अर्जुन उस पर तीर नहीं चलाता है क्योंकि वो निहत्था था, लेकिन कृष्ण कहते हैं मारो उसे याद करो, अभिमन्यु भी निहत्था था। मनुष्यता के इतिहास की बात करें तो मर्दानगी के साथ नपुंसकता के विशिष्ट संयोग के कारण आज भी अर्जुन सबसे अलग दिखते हैं।

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