जब प्रमोद महाजन ने चीनियों को समझाया था भारतीय लोकतंत्र का मतलब

चीन के एक दौरे पर बीजेपी के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन ने एक वाकया 1997 में संसद में पेश किया था। तब उन्होंने बताया था कि जब चीन के लोगों ने सुना कि वो सदन में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी विपक्ष में बैठे हैं।

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बीजेपी नेता प्रमोद महाजन। फोटोः एजेंसी)

चीन के एक दौरे पर बीजेपी के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन ने एक वाकया 1997 में संसद में पेश किया था। तब उन्होंने बताया था कि जब चीन के लोगों ने सुना कि वो सदन में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी विपक्ष में बैठे हैं। उनका कहना था कि चीन के नेता भी उनकी बात सुनकर भौचक रह गए थे।

लोकसभा में प्रमोद महाजन ने लोकतंत्र का दिलचस्प उदाहरण पेश करते हुए चीन दौरे की बात की थी। उन्होंने कहा था कि ‘हम चीन संसदीय यात्रा पर गए थे। आज कल अध्यक्ष जी चीन में जनतंत्र जानने की बड़ी उत्सुक्ता है। जब चीन गया था तो रमाकांत जी भी थे, चिंतामणि भी थे और कुछ राज्यसभा के मित्र भी।

महाजन ने बताया कि वहां पर कुछ लोगों ने हमसे पूछा कि आपकी डेमोक्रेसी कैसे चलती है। क्योंकि उन लोगों का संसद अलग, इलेक्शन अलग। इस पर रमाकांत जी ने मुझे कहा कि इन्हें बताइए हमारे यहां डेमोक्रेसी कैसे चलती है। तो मैंने उन्हें बताया कि मैं प्रमोद महाजून हूं। मैं लोकसभा का सदस्य हूं, मैं सबसे बड़ी पार्टी से हूं और हम विपक्ष में हैं। इस पर चीनी आदमी ने मुझे देखकर कहा कि आपकी पार्टी के पास सबसे ज्यादा सांसद है ? मैंने कहा- हां।

प्रमोद महाजन ने बताया कि फिर उन्होंने चिंतामणि जी की ओर इशारा करते हुए कहा कि ये संसद में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के लीडर हैं, लेकिन यह सरकार के बाहर रहकर सरकार का समर्थन कर रहे हैं। फिर उन्होंने दूसरे नेता के बारे में बताया कि इनकी पार्टी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है और यह फ्रंट के अंदर है और सरकार से बाहर। फिर उन्होंने रमाकांत जी के बारे में बताया कि ये अपनी पार्टी के अकेले मेंमर हैं और इन्ही की सरकार है।

गौरतलब है कि अमित शाह से पहले बीजेपी में महाजन को एक मास्टर रणनीतिकार माना जाता था। वह एक सम्मोहक वक्ता थे। यह प्रमोद महाजन थे, जो 2004 के राष्ट्रीय चुनाव अभियान में भाजपा के चुनाव प्रबंधक थे और महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा गठबंधन के पीछे का दिमाग भी। वह अटल बिहारी वाजपेयी की दोनों सरकारों में केंद्रीय मंत्री थे।

महाजन उन कुछ राजनेताओं में से एक थे, जिन्होंने 2004 के हार की पूरी जिम्मेदारी ली थी। फिर भी उन्हें संकटमोचक के रूप में देखा गया। वह वाजपेयी और आडवाणी दोनों के करीबी सहयोगी थे। 2003 के राजस्थान विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत के लिए उन्हें पहले ही श्रेय दिया गया था। प्रमोद महाजन की उनके भाई प्रवीण ने 2006 में गोली मारकर हत्या कर दी थी।

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