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अरनब गोस्वामी और बरखा दत्त की ‘लड़ाई’ में रवीश कुमार ने भी की तीखी टिप्पणी

अरनब ने अपने शो न्‍यूजआवर में कुछ पत्रकारों पर आरोप लगाया था कि वे कश्‍मीर में अलगाववाद को बढ़ावा दे रहे हैं।
Author नई दिल्‍ली | July 29, 2016 18:01 pm
रवीश कुमार ने लिखा है, ”एंकर सरकार से कह रहा है कि वो पत्रकारों पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाये। जिस दिन पत्रकार सरकार की तरफ हो गया, समझ लीजियेगा वो सरकार जनता के ख़िलाफ़ हो गई है। ”

सीनियर पत्रकार बरखा दत्‍त के अरनब गोस्‍वामी पर हमले के बाद अब कुछ अन्‍य पत्रकारों ने भी टाइम्‍स नाऊ के एडिटर-इन-चीफ पर हमला बोला है। एनडीटीवी के वरिष्‍ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने लेटेस्‍ट ब्‍लॉग में बिना नाम लिए अरनब पर तीखी टिप्‍पणी की है। रवीश ने लिखा है, ”एंकर सरकार से कह रहा है कि वो पत्रकारों पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाये। जिस दिन पत्रकार सरकार की तरफ हो गया, समझ लीजियेगा वो सरकार जनता के ख़िलाफ़ हो गई है। पत्रकार जब पत्रकारों पर निशाना साधने लगे तो वो किसी भी सरकार के लिए स्वर्णिम पल होता है।” माना जा रहा है कि रवीश का यह इशारा अरनब गोस्‍वामी की ओर है। अरनब ने अपने शो न्‍यूजआवर में कुछ पत्रकारों पर आरोप लगाया था कि वे कश्‍मीर में अलगाववाद को बढ़ावा दे रहे हैं। अरनब ने तीखा हमला करते हुए पूछा था कि क्‍या ऐसे लोगों की तलाश करके उनके खिलाफ केस नहीं चलाया जाना चाहिए।

क्‍या लिखा रवीश ने
रवीश ने अपने ब्‍लॉग ‘कस्‍बा’ पर ‘सांप्रदायिकता का नया नाम है राष्ट्रवाद’ शीर्षक से आर्टिकल लिखा है। इसमें उन्‍होंने लिखा, ‘आप जो टीवी पर एंकरों के मार्फ़त उस अज्ञात व्यक्ति की महत्वकांक्षा के लिए रचे जा रहे तमाशे को पत्रकारिता समझ रहे हैं वो दरअसल कुछ और हैं। आपको रोज़ खींच खींच कर राष्ट्रवाद के नाम पर अपने पाले में रखा जा रहा है ताकि आप इसके नाम पर सवाल ही न करें। दाल की कीमत पर बात न करें या महँगी फीस की चर्चा न करें। इसीलिए मीडिया में राष्ट्रवाद के खेमे बनाए जा रहे हैं।एंकर सरकार से कह रहा है कि वो पत्रकारों पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाये। जिस दिन पत्रकार सरकार की तरफ हो गया, समझ लीजियेगा वो सरकार जनता के ख़िलाफ़ हो गई है। पत्रकार जब पत्रकारों पर निशाना साधने लगे तो वो किसी भी सरकार के लिए स्वर्णिम पल होता है। बुनियादी सवाल उठने बंद हो जाते हैं।जब भविष्य निधि फंड के मामले में चैनलों ने ग़रीब महिला मज़दूरों का साथ नहीं दिया तो वो बंगलुरू की सड़कों पर हज़ारों की संख्या में निकल आईं। कपड़ा मज़दूरों ने सरकार को दुरुस्त कर दिया। इसलिए लोग देख समझ रहे हैं। जे एन यू के मामले में यही लोग राष्ट्रवाद की आड़ लेकर लोगों का ध्यान भटका रहे थे। फ़ेल हो गए। अब कश्मीर के बहाने इसे फिर से लांच किया गया है!

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा है कि बुरहान वानी को छोड़ दिया जाता अगर सेना को पता होता कि वह बुरहान है। बीजेपी की सहयोगी महबूबा ने बुरहान को आतंकवादी भी नहीं कहा और अगर वो है तो उसके देखते ही मार देने की बात क्यों नहीं करती हैं जैसे राष्ट्रवादी करते हैं। महबूबा मुफ्ती ने तो सेना से एक बड़ी कामयाबी का श्रेय भी ले लिया कि उसने अनजाने में मार दिया। अब तो सेना की शान में भी गुस्ताख़ी हो गई। क्या महबूबा मुफ्ती को गिरफ़्तार कर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया जाए? क्या एंकर लोग ये भी मांग करेंगे ? किस हक से पत्रकारों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चलाने की बात कर रहे हैं? जिस सरकार के दम पर वो कूद रहे हैं क्या वो सरकार ऐसा करेगी कि महबूबा को बर्खास्त कर दे? क्या उस सरकार का कोई बड़ा नेता महबूबा से यह बयान वापस करवा लेगा?’

ओम थानवी ने भी साधा निशाना
जनसत्‍ता के पूर्व एडिटर और वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी ने भी अरनब गोस्‍वामी पर निशाना साधा है। थानवी ने अपने फेसबुक पोस्‍ट में आरोप लगाया कि अरनब अपने शो में किसी थानेदार की तरह हड़काते हैं और वहां बोलने की आजादी नहीं होती।

अब ओम थानवी का टाइम्‍स नाऊ पर निशाना- थानेदार की तरह हड़काते हैं अरनब, बोलने के अधिकार की करते हैं हत्‍या

क्‍या है पूरा मामला
अरनब गोस्‍वामी ने अपने शो न्‍यूज ऑवर में कश्‍मीर मुद्दे पर pro pak doves silent शीर्षक से चर्चा रखी। चर्चा के दौरान जीडी बक्‍शी ने मीडिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर क्‍यों कुछ बड़े अखबारों ने बुरहान वानी की लाश की फोटो छापी? ऐसा करना क्‍यों जरूरी था? जीडी बक्‍शी ने कहा, ‘यह इन्‍फॉर्मेशन वॉरफेयर (सूचना के जरिए जंग) का युग है। हम मीडिया के हमले का शिकार हो रहे हैं।’ बक्‍शी ने कहा कि कुछ मीडिया वाले कश्‍मीरी लोगों को अलगाव के लिए भड़का रहे हैं। इस दौरान अरनब ने कहा कि वे इससे पूरी तरह सहमत हैं। इससे पहले, कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए अरनब गोस्‍वामी ने कहा, ”जब लोग खुलेआम भारत का विरोध और पाकिस्‍तान व आतंकवादियों के लिए समर्थन जाहिर करते हैं तो ऐसे लोगों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए?” अरनब ने कहा कि वे ऐसे लोगों को स्‍यूडो लिबरल्‍स (छद्म उदारवादी) कहते हैं। ऐसे लोगों का ट्रायल होना चाहिए। अरनब ने यह भी कहा कि मीडिया में कुछ खास लोग बुरहान वाणी के लिए हमदर्दी दिखाते हैं। यह वही ग्रुप है जो अफजल गुरु के लिए काम करता है और उसकी फांसी को साजिश बताता है। अरनब ने कहा कि मीडिया में छिपे ऐसे लोगों पर बात होनी चाहिए।

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बरखा ने साधा निशाना
कार्यक्रम के अगले दिन बरखा ने फेसबुक पोस्‍ट के जरिए अरनब के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 27 जुलाई को बरखा ने अपने फेसबुक पोस्‍ट में लिखा, ‘टाइम्‍स नाऊ मीडिया पर अंकुश लगाने, जर्नलिस्‍ट्स पर केस चलाने और उन्‍हें सजा देने की बात कहता है? क्‍या यह शख्‍स जर्नलिस्‍ट है? मैं उनकी ही तरह इस इंडस्‍ट्री का हिस्‍सा होने पर शर्मिंदा हूं। जो चीज चोट पहुंचा रही है, वो उनका खुल्‍लमखुल्‍ला बुजदिली भरा पाखंडपूर्ण रवैया है। वे पाकिस्‍तानपरस्‍त कबूतरों की बात तो करते हैं, लेकिन जम्‍मू-कश्‍मीर में गठबंधन को लेकर हुए समझौते का एक शब्‍द भी जिक्र नहीं करते। इस समझौते के मुताबिक बीजेपी और पीडीपी को पाकिस्‍तान और हुर्रियत से बात करनी है। वे मोदी की पाकिस्‍तान से नजदीकी पर चुप हैं, जिस पर मुझे भी कोई आपत्‍त‍ि नहीं है। मुझे आपत्‍त‍ि इस बात की है कि चूंकि अरनब गोस्‍वामी देशभक्‍त‍ि का आकलन इन विचारों से करते हैं तो वे सरकार पर चुप क्‍यों हैं? चमचागिरी? सोचिए, एक जर्नलिस्‍ट सरकार को उपदेश देता है कि मीडिया के कुछ धड़ों को बंद कर देना चाहिए। उन्‍हें बतौर आईएसआई एजेंट्स और आतंकियों के हमदर्द के तौर पर पेश करता है। उनके खिलाफ मामला चलाने और कार्रवाई करने की बात करता है।’

बरखा दत्‍त ने एक बार फिर साधा निशाना
शुक्रवार को एनडीटीवी वेबसाइट पर लेख में बरखा ने लिखा कि अरनब उन्‍हें डरा नहीं पाएंगे। उन्‍होंने अपनी फेसबुक पोस्‍ट का जिक्र करते हुए कहा कि कई लोगों ने इस पर सवाल उठाए। कई लोगों ने जानना चाहा कि मैंने ऐसा क्‍यों कहा। कई लोगों ने साहस दिखाते हुए समर्थन दिया। वहीं ऐसे भी लोग थे जो जिन्‍होंने निराशाजनक रूप से चुप्‍पी ओढ़ ली। बरखा ने लिखा, ”ईमानदारी और आजादी से रिपोर्ट करना हमारा संवैधानिक अधिकार है। इस दौरान यह भी ध्‍यान रखता होता है कि न तो हम भारतीय सेना के दुश्‍मन समझे जाएं और न आतंक के समर्थक। भारत के मीडिया इतिहास में यह अभूतपूर्व समय है जब एक बड़ा पत्रकार सरकार से कह रहा है कि अन्‍य पत्रकारों को उनकी कश्‍मीर पर अलग-अलग दृष्टिकोण से की गई रिपोर्टिंग के लिए ट्रायल चलाया जाए।”

बरखा दत्‍त ने अरनब गोस्‍वामी पर फिर बोला हमला- क्‍या मोदी सरकार से डरते हो

रवीश कुमार का पूरा ब्‍लॉग नीचे पढ़ें (साभार: naisadak.org)

सांप्रदायिकता का नया नाम है राष्ट्रवाद

मीडिया के ज़रिये आपके साथ एक खेल खेला जा रहा है। किसी व्यक्ति की राजनीतिक महत्वकांक्षा के लिए बहुत सारे लोग राष्ट्रवाद की गौ रक्षा में लगा दिये गए हैं।गुजरात के दलितों ने गौ रक्षा का उपाय कर दिया तो अब गौ रक्षकों ने राष्ट्रवाद को गाय बता कर उत्पात मचाना शुरू कर दिया है। आम आवाम को यह बात देर से समझ आएगी लेकिन तब तक वह सियासी खेमों की बेड़ियों में इस कदर जकड़ दिया जाएगा कि निकलना मुश्किल हो जाएगा। शिकंजों के ज़ोर से उसके पाँव लहूलुहान होंगे मगर वो आज़ाद नहीं हो पाएगा।

इस दौर में सांप्रदायिकता अलग अलग ब्रांड रुप में आ रही है। लव जिहाद,आबादी का ख़ौफ़,गौ माँस,धार्मिक झंडे को पाकिस्तानी बताना, पलायन, गौ रक्षा। ये सब उस ब्रांड के अलग अलग वर्जन हैं। जैसे टूथपेस्ट के अलग अलग ब्रांड हो सकते हैं। पातंजलि, कोलगेट, मिस्वाक, पेप्सोडेंट।टूथपेस्ट है सांप्रदायिकता। इसे बनाने वाला कोई कारपोरेशन भी होगा। उस कारपोरेशन का नाम है राष्ट्रवाद। यह अलग अलग नाम से उसी एक टूथपेस्ट को बेच रहा है। गौ रक्षा तो कभी राष्ट्रवाद।

अब इसे बेचने के लिए उसे किराना स्टोर भी चाहिए और सुपर मॉल भी। जिसका नाम है मीडिया। जब वह टूथपेस्ट का ब्रांड अलग अलग लाँच कर सकता है तो मीडिया का भी लाँच कर सकता है। वहाँ भी आका एक ही है मगर उनके चैनल कई हैं। अब हो यह रहा है कि माडिया की दुकान में सांप्रदायिकता बेचने के लिए राष्ट्रवाद का कवर चढ़ाया जा रहा है। इतने सारे टूथपेस्ट हैं, कोई कौन सा वाला ख़रीदेगा,इसका भी इलाज है। एक ही बात कहने वाले भाँति भाँति के एंकर या भाँति भाँति के एंकरों को एक ही बात कहने का प्रशिक्षण।

आप कभी तो सोचिये कि मीडिया राष्ट्रवाद को लेकर इतना उग्र क्यों हो रहा है? क्यों हर बार सेना और सीमा के नाम पर ये राष्ट्रवाद उभारा जाता है? क्यों जब ये ठंडा पड़ता है तो गौ रक्षा आ जाता है? गौ रक्षा पिट जाता है तो राष्ट्रवाद आ जाता है? इस लड़ाई को आप भले ही चंद एंकरों के बीच का मामला समझें लेकिन ऐसा है नहीं। कोई है जो यह खेल खेल रहा है। कोई है जिसकी राजनीतिक महत्वकांक्षा के लिए यह खेल खेला जा रहा है उसका चेहरा आप कभी नहीं देख पाएँगे क्योंकि महाकारपोरेशन किसके इशारे पर चलता है, उसका चेहरा कोई नहीं देख पाता है। सिर्फ लोग गिने जाते हैं और लाशें दफ़नाई जाती हैं। पूरी दुनिया में ऐसा ही चलन है।

राष्ट्रवाद जिनमें भरपूर है यानी जिनके ट्यूब में पेस्ट भरा है उन्होंने क्या कर लिया? इसका एक सबसे बड़ा अभियान लाँच हुआ था जो आज भी लाँच अवस्था में ही है। स्वच्छ भारत अभियान। दो साल पूर्व बहुत से नेता,कार्यकर्ता, अभिनेता झाड़ू लेकर खूब ट्वीट करते थे। ट्वीटर पर नौ रत्न नियुक्त करते थे कि ये भी सफाई करेंगे तभी देश साफ होगा। कहा गया कि अकेले सरकार से कुछ नहीं होगा। सबको आगे आना होगा। आज वो लोग कहाँ है? ट्वीटर के नौ रत्न कहाँ हैं? स्वच्छता अभियान कहाँ है? वो राष्ट्रवादी भावना कहाँ है जिसे लेकर ये लोग चरणामृत छिड़क रहे थे कि अब हम साफ सुथरा होने वाले हैं। जो लोग आए थे उनका राष्ट्रवाद क्यों ठंडा पड़ गया? दो साल में तो वो अपनी पूरी कालोनी साफ कर देते। क्या उन्होंने उन एंकरों को देखना छोड़ दिया जिन्हें राष्ट्रवाद का टोल टैक्स वसूलने का काम दिया गया है?

स्वच्छ भारत अभियान के तहत नई दिल्ली के बाल्मीकि मंदिर के पास अनोखा शौचालय बना। क्या दिल्ली में वैसा शौचालय और भी कहीं रखा गया? ऐसा है तो दो साल में दिल्ली में कम से कम सौ पचास ऐसे शौचालय तो रखे ही गए होंगे? क्या आपको दिखते हैं? क्या आपको दिल्ली के मोहल्लों में या अपने किसी शहर में ऐसे शोचालय, कूड़ेदान दिखते हैं जो इस अभियान के तहत रखे गए हों? उनकी साफ सफाई होती है? एक या दो कूड़ेदान रख खानापूर्ति की बात नहीं कर रहा। अगर कहीं ये सफल भी होगा तो इन्हीं सब व्यवस्थाओं के दुरुस्त होने की वजह से न कि ट्वीटर पर छाये गाली गुंडों के राष्ट्रवाद से।

इस कहानी का मतलब यह हुआ कि आपकी समस्या की वजह राष्ट्रवाद में कमी नहीं है। स्वच्छता अभियान इसलिए फ़ेल हुआ क्योंकि दिल्ली को साफ करने के लिए कई हजार सफाई कर्मचारी की ज़रूरत थी। क्या भर्ती हुई? जो मौजूदा कर्मचारी हैं उन्हीं का वेतन न मिलने की ख़बरें आती रहती हैं। उन्होंने अपनी सैलरी के लिए दिल्ली की सड़कों पर कचरा तक फेंक दिया। अब आप इस तरह के सवाल न पूछ बैठें इसलिए आपका इंतज़ाम किया गया है। लगातार ऐसे मुद्दे पेश किये जा रहे हैं जिनका संबंध कभी सीधे सांप्रदायिकता से हो या राष्ट्रवाद से। ये इसलिए हो रहा है कि आप हमेशा काल्पनिक दुनिया में रहने लगे, वैसे रहते भी हैं। कोई है जो आपको ख़ूब समझ रहा है। यही कि आप सर नीचा किये स्मार्ट फोन पर बिजी हैं। इन्हीं स्मार्ट फोन पर एक गेम आ गया है। पोकेमौन। खेलते खेलते इसी बहाने अपने मोहल्ले में स्वच्छता खोज आइयेगा। आपकी ट्रेनिंग ऐसी कर दी गई है कि आप लोगों को ही कोसने लगेंगे। सरकार को नहीं। यह हुआ ही इसलिए है कि कोई आपको अलग-अलग नामी -बेनामी संस्थाओं की मदद से राष्ट्रवाद के ट्रेड मिल पर दौड़ाए रखे हुए है।

हमारा सैनिक क्यों अठारह हज़ार मासिक पाता है? क्या सांसद विधायक का वेतन एक सैनिक से ज़्यादा होना चाहिए? सैनिकों पर तो कम से कम सीमा पर खड़े खड़े देश लूटने का इल्ज़ाम नहीं है। वे तो जान दे देते हैं। विधायकों सांसदों में से कितने जेल गए और कितने और जा सकते हैं मगर इनसे सरकारें बनतीं हैं और चलती हैं। इनके अपार फंड की गंगोत्री किधर है? राष्ट्रवाद की चिन्ता करनी है तो यह बोलो कि सीमा से छुट्टी पर लौटने वाला जवान जनरल बोगी या सेकेंड क्लास में लदा कर क्यों जाता है? उसके लिए एसी ट्रेन क्यों नहीं बुक होती? उसका बच्चा ऐसे स्कूल में क्यों पढ़ता जिसका मास्टर जनगणना करने गया है। उसकी सैलरी पचास हज़ार क्यों नहीं है?

आप जो टीवी पर एंकरों के मार्फ़त उस अज्ञात व्यक्ति की महत्वकांक्षा के लिए रचे जा रहे तमाशे को पत्रकारिता समझ रहे हैं वो दरअसल कुछ और हैं। आपको रोज़ खींच खींच कर राष्ट्रवाद के नाम पर अपने पाले में रखा जा रहा है ताकि आप इसके नाम पर सवाल ही न करें। दाल की कीमत पर बात न करें या महँगी फीस की चर्चा न करें। इसीलिए मीडिया में राष्ट्रवाद के खेमे बनाए जा रहे हैं।एंकर सरकार से कह रहा है कि वो पत्रकारों पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाये। जिस दिन पत्रकार सरकार की तरफ हो गया, समझ लीजियेगा वो सरकार जनता के ख़िलाफ़ हो गई है। पत्रकार जब पत्रकारों पर निशाना साधने लगे तो वो किसी भी सरकार के लिए स्वर्णिम पल होता है। बुनियादी सवाल उठने बंद हो जाते हैं।जब भविष्य निधि फंड के मामले में चैनलों ने ग़रीब महिला मज़दूरों का साथ नहीं दिया तो वो बंगलुरू की सड़कों पर हज़ारों की संख्या में निकल आईं। कपड़ा मज़दूरों ने सरकार को दुरुस्त कर दिया। इसलिए लोग देख समझ रहे हैं। जे एन यू के मामले में यही लोग राष्ट्रवाद की आड़ लेकर लोगों का ध्यान भटका रहे थे। फ़ेल हो गए। अब कश्मीर के बहाने इसे फिर से लांच किया गया है!

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा है कि बुरहान वानी को छोड़ दिया जाता अगर सेना को पता होता कि वह बुरहान है। बीजेपी की सहयोगी महबूबा ने बुरहान को आतंकवादी भी नहीं कहा और अगर वो है तो उसके देखते ही मार देने की बात क्यों नहीं करती हैं जैसे राष्ट्रवादी करते हैं। महबूबा मुफ्ती ने तो सेना से एक बड़ी कामयाबी का श्रेय भी ले लिया कि उसने अनजाने में मार दिया। अब तो सेना की शान में भी गुस्ताख़ी हो गई। क्या महबूबा मुफ्ती को गिरफ़्तार कर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया जाए? क्या एंकर लोग ये भी मांग करेंगे ? किस हक से पत्रकारों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चलाने की बात कर रहे हैं? जिस सरकार के दम पर वो कूद रहे हैं क्या वो सरकार ऐसा करेगी कि महबूबा को बर्खास्त कर दे? क्या उस सरकार का कोई बड़ा नेता महबूबा से यह बयान वापस करवा लेगा?

इसलिए राजनीति को राजनीति की तरह देखिये। इसमें अगर राष्ट्रवाद का इस्तमाल होगा तो एक दिन राष्ट्रवाद की हालत भी ये नेता देश सेवा जैसी कर देंगे।जब भी वे देश सेवा का नाम ज़ुबान पर लाते हैं,लगता है कि झूठ बोल रहे हैं। बल्कि उनके मुँह से राष्ट्रवाद खोखला ही लगता है। हम सब राष्ट्रवादी हैं। इसे पता करने के लिए रोज़ रात को नौ बजे टीवी देखने की नौबत आ जाए तो आपको राष्ट्रवाद नहीं दाद खाज खुजली है। नीम हकीम जिसकी दवा ज़ालिम लोशन बताते हैं।

मैं आपको मुफ़्त में एक सलाह देता हूँ।चैनलों को देखने के लिए केबल पर हर महीने तीन से पाँच सौ रुपया खर्च हो ही जाता होगा।जब पाँच सौ रुपया देकर राष्ट्रवाद की आड़ में हिन्दू- मुस्लिम के बीच नफ़रत की गोली ही लेनी है तो आप केबल कटवा दीजिये। जब आपने नफरत ठान ही ली है तो कीजिये नफ़रत। इसके लिए केबल के पाँच सौ और रद्दी अख़बारों के पांच सौ क्यों दे रहे हैं? अपना एक हज़ार तो बचा लीजिये!

तो आप से गुज़ारिश है कि राजनीति और राष्ट्रवाद में फर्क कीजिये। यह वो राष्ट्रवाद नहीं है जो आप समझ रहे हैं। यह राष्ट्रवाद के नाम पर सांप्रदायिकता है जो आप देखना ही नहीं चाहते। सांप्रदायिकता का नया नाम है राष्ट्रवाद। ज़रूरत है राष्ट्रवाद को सांप्रदायिकता से बचाने की और टीवी कम देखने की।

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  1. S
    S k
    Jul 29, 2016 at 4:40 pm
    Arnab is not a good anchor because He cry like aconstable before the gust. It shows he have no manners.He has no right tocry
    (1)(0)
    Reply
    1. H
      Hemant bohra
      Jan 30, 2017 at 9:59 am
      राजदीप बरखा और रविश इन दोगलों की वजह से पत्रकारिता बदनाम थी अर्णब ने कुछ हद तक स दाग को धोया है धन्यवाद अर्णबजी
      (0)(0)
      Reply
      1. H
        Hemant bohra
        Jan 30, 2017 at 10:05 am
        राजदीप बरखा रविश ये तो 100%देश द्रोही पत्रकारिता के नमूने है क्यों की इनके आप ट्विटर आदि सोश्यल मिडिया पर अकांउंट देख लो सिर्फ हजारों गालिया ही खाते है ये अगर ये थोडा भी ी होते तो कोई 10% तो इन्हें अच्छा कहता दूसरी तरफ अनुराग मुस्कान अर्णब गोस्वामी सुधीर चौधरी आदि को देखो लोग इनका सम्मान करते है
        (0)(0)
        Reply
        1. K
          Kamlesh Kumar
          Aug 1, 2016 at 7:07 pm
          Most of the journalists like Ravi's and Barkha promote anti nationalism......they believe in exaggeration....not the patriotism. Shame on them....
          (0)(0)
          Reply
          1. V
            Vikas
            Jul 30, 2016 at 10:02 am
            Yeh toh wahi hum kisi ko kuch bhi kahey media trail chalaye . NDTV is only news channel who try to collect sympathy for anti nationals...
            (2)(0)
            Reply
            1. R
              rohit jain
              Jul 30, 2016 at 2:22 am
              वेल साइड RAVISH सच में आम AVAAM को सच समझने में वक़्त लगेगा इसीलिए to hamara desh वेस्ट से ४०-५० saal पीछे kehte hai
              (0)(0)
              Reply
              1. R
                Rajesh Singh
                Aug 3, 2016 at 12:27 pm
                To tumhara manana hai ki patrakarita ka Matlab hai virodh ke Nam pr virodh Krna chahiye.matter kuch bhi fur change darker pr nishana sadhne ke Shankar me drag virodh bhi kyo Na Krna pade. Little ho tum log Vo bhi annual darje ke Jo roti hi dear virodh ke Nam pr kahte hai
                (0)(0)
                Reply
                1. S
                  shivraj
                  Jul 29, 2016 at 2:30 pm
                  भाई साहब वैसे राष्ट्रवाद कोनसी चिड़िया है इस पर भी प्रकाश डाल देते. जब आपने दिखाया तब भी देखा अब भी देखते है. और भगवान् ने अक्ल आपके अलावा ओरो को भी दी है. कृपया NDTv से कहे की इस जहरीले वातावरण से दुखी हो कर अपना चैनल बंद कर ले जब टीवी का उन्माद ख़तम हो जाए फिर दुकान खोल ले. वैसे इतनी चिंता देश के लिए 2साल पहले तो नहीं थी . मजाक कर रहा था पर मिर्ची तो लगती है सामना कीजये लोगो के सामने रिरियाये मत. जनवादी सामाजवादी साम्यवादी राष्ट्वादी और बढ़ती आबादी. वैसे रामदेव के विज्ञापन तो मिल रहे होंगे
                  (3)(4)
                  Reply
                  1. मनोज बरडिया
                    Jul 30, 2016 at 10:17 am
                    हमेशा दुसरो को भला ा कहने वाले इन थता कथित पत्रकारों पर किसी ने आवाज उठाई तो बेचेन हो उठे ।
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                    Reply
                    1. B
                      B C
                      Jul 29, 2016 at 6:59 pm
                      Ravish,Barkha ko chot pahuchi hain.en gaddaro se desh dukhi hain n ki goswami se.
                      (1)(0)
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