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आरएसएस और हेडगेवार की ‘देशभक्ति’ पर सवाल उठाने वाला लेख शेयर करके ट्विटर पर घिरे रामचंद्र गुहा

ट्विटर पर प्रतिकूल टिप्पणियां आने के बाद रामचंद्र गुहा ने एक अन्य ट्वीट में कहा, "प्रगतिशील और उदार विचारों से आरएसएस का विरोध इतना पुराना और गहरा है कि उसका नाम बदलकर रिएक्शनरी सेक्टेरियन संघ रख देना चाहिए।"

Author Updated: April 17, 2017 4:41 PM
डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में आरएसएस की स्थापना की थी।

ब्रिटिश राज से भारत को आजाद कराने की लड़ायी के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार की “देशभक्ति” पर सवाल उठाने वाले लेख को ट्विटर पर शेयर करने की वजह से इतिहासकार रामचंद्र गुहा को सोशल मीडिया यूजर्स के गुस्से का शिकार होना पड़ा। रामचंद्र गुहा ने इस लेख को ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा, “आरएसएस जिसने राष्ट्रीय ध्वज का विरोध किया और औपनिवेशिक सरकार के आगे घुटने पर झुक गया।” लेकिन कई ट्विटर यूजर्स को गुहा का कमेंट और शायद लेख का लिंक शेयर करना पसंद नहीं आया। हालांकि कुछ लोगों ने उनका समर्थन भी किया है।

गुहा के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए योगेंद्र नामक ट्विटर यूजर ने लिखा है, “आजादी के बाद कई संवाददाता और पत्रकार नेहरू परिवार के सामने यही कर रहे थे और इनाम पा रहे थे।” पैदाइशी नामक ट्विटर हैंडल ने गुहा के ट्वीट के जवाब में लिखा है, “पहली बात ये कि झंडा गांधी एंड कंपनी ने बनाया था और आरएसएस ब्रिटिश के आगे झुक गया था ये झूठ है।” अनिलसंगीता हैंडल से कमेंट किया गया है, “पूरा देश जानता है कि नेहरू ब्रिटिश चमचे थे।” बहुत से ट्विटर यूजर्स गुहा पर अभद्र टिप्पणियां की हैं।

समीर कांत दास नामक ट्विटर यूजर ने लिखा है, “शायद इसीलिए वो इतिहास का पुनर्लेखन करना चाहते हैं, है या नहीं?” लॉर्ड जोकर नामक ट्विटर हैंडल ने लिखा, “जल्द ही आरएसएस सब कुछ इतिहास के अपने संस्करण से बदल देगा! उसके बाद आप पढ़ेंगे कि उत्तरी ध्रुव एक समय भारत का अंग था।” ट्विटर पर प्रतिकूल टिप्पणियां आने के बाद गुहा ने एक अन्य ट्वीट में कहा, “प्रगतिशील और उदार विचारों से आरएसएस का विरोध इतना पुराना और गहरा है कि उसका नाम बदलकर रिएक्शनरी सेक्टेरियन संघ रख देना चाहिए।”

डॉक्टर केशव राम बलिराम हेडगेवार ने 1925 में आरएसएस की स्थापना की थी। द वायर पर छपे लेख में दावा किया गया कि आरएसएस आजादी की लड़ायी से दूर रहने के साथ ही ब्रिटिश हुकूमत के आज्ञाकारी संगठन की तरह काम करते थे। लेख में दावा किया गया है कि 1930 में जब महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह किया तो आरएसएस उसमें शामिल नहीं हुआ। हेडगेवार निजी तौर पर गांधीजी के आह्वान पर आंदोलन में शामिल हुए लेकिन उन्होंने अपने संगठन को इससे दूर रखा। हालांकि 1931 के बाद हेडगेवार कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले स्वतंत्रता संग्राम से पूरी तरह अलग हो गये। लेख में दावा किया गया है कि 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में भी आरएसएस ने हिस्सा नहीं लिया था।

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