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Rukhmabai के संघर्ष की वजह से ही बना बाल विवाह के खिलाफ भारत में पहला कानून

Rukhmabai भारत की पहली महिला डॉक्टर तो थी इसके साथ ही संबंध बनाने के लिए रजामंदी की उम्र से जुड़ा कानून 1891 को सबके सामने लाने के पीछे भी उनकी सबसे बड़ी भूमिका मानी जाती है।

Rukhmabai Raut History: रुखमाबाई पढ़ने की चाह रखती थी लेकिन उनकी बिना मर्जी के उनका बाल विवाह करवा दिया गया था।

Rukhmabai भारत की पहली महिला डॉक्टर तो थी इसके साथ ही संबंध बनाने के लिए रजामंदी की उम्र से जुड़ा कानून 1891 को सबके सामने लाने के पीछे भी उनकी सबसे बड़ी भूमिका मानी जाती है। Rukhmabai पढ़ने की चाह रखती थी लेकिन उनकी बिना मर्जी के उनका बाल विवाह करवा दिया गया था। उनका विवाह बाल विवाह के बुरे उदाहरणों में से एक है। Rukhmabai की शादी 11 साल की उम्र में उनसे 8 साल बड़े दादाजी भिकाजी से करवा दिया गया। उस समय दादाजी Rukhmabai के परिवार के साथ रहते थे लेकिन भिकाजी की माता की मृत्यु के बाद वो अपने रिश्तेदार के यहां चले गए। Rukhmabai ने दादाजी के साथ रहते हुए चर्च मिशनरी लाइब्रेरी से किताबें लाकर पढ़ती थी लेकिन भिकाजी उनकी पढ़ाई के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं थे। इसलिए Rukhmabai अपने पति का घर छोड़कर अपने माता-पिता के घर में पढ़ाई पूरी करने के लिए आ गईं। अपने जीवन में उन्होंने कड़े संघर्ष के बाद सफलता हासिल की थी।

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Rukhmabai अपने पेन नेम ‘ए हिंदू लेडी’ से कई अखबारों में लिखती थी, टाइम्स ऑफ इंडिया में उन्होनें लिखा कि ‘मैं उन हिंदू महिलाओं में से हूं जिनका विवाह बचपन में ही कर दिया जाता है, इस कुरिति ने मेरी जिंदगी से खुशियां नष्ट कर दी हैं।’ भिकाजी ने 1884 में Rukhmabai को नोटिस भेजा जिसमें उन्हें अपने पति के साथ रहने के लिए कहा गया था। 1885 में बॉम्बे हाई कोर्ट में उनका केस आया जिसमें जज ने फैसला सुनाया कि उनके पति का Rukhmabai पर अधिकार बनता है इसलिए उन्हें अपने पति के साथ रहना होगा। यदि वो इस फैसले को नहीं मानती हैं तो सजा के तौर पर उन्हें जेल जाना होगा। रुखमाबाई इतनी बेबाक थी उन्होनें कहा कि बिना मेरी मर्जी के इस रिश्ते में रहने से अच्छा है मैं जेल जाना पसंद करुंगी। कोर्ट ने भिकाजी के पक्ष में फैसला दिया।

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Rukhmabai हार मानने वालों में से नहीं थी उन्होनें महारानी विक्टोरिया को इस शादी और केस के बारे में लिखा। 1888 में ये फैसला आया कि रुखमाबाई को पति भिकाजी को दो हजार रुपए देने होंगे और भिकाजी को केस वापस लेना होगा। इसके बाद रुखमाबाई अपनी पढ़ाई के लिए लंडन चली गई। इस केस ने रुखमाबाई के साथ भारत में कई महिलाओं की शिक्षा के लिए रास्ते खोल दिए। जब रुखमाबाई का केस कोर्ट में था तब सिर्फ हिंदू रिवाजों पर डिबेट नहीं हुई इसके साथ महिलाओं की शिक्षा के स्तर पर भी एक लंबी डिबेट छिड़ी। रुखमाबाई ने शिक्षा और अपनी निडरता से अपने साथ आगे आने वाली महिलाओं की पीढ़ी के लिए शिक्षा के रास्ते तो खोले और उन्हें बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरितियों से मुक्त करवाया।

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