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हिंसा, हालात और बाइडन

पिछले साल जब अमेरिका में अश्वेत युवक फ्लॉयड की हत्या हुई थी तब आमतौर पर ऐसे मामलों से खुद को दूर रखने वाला विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस हिंसा के विरोध में खुलकर सामने आ गया था। डब्लूएचओ के महानिदेशक टैड्रॉस गैबरयेसस ने कहा था कि वे दुनियाभर में नस्लवाद के खिलाफ चल रहे आंदोलन का खुलकर समर्थन करते हैं क्योंकि उनका संगठन किसी भी तरह के भेदभाव को स्वीकार नहीं करता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन।

नई सत्ता के रूप में अमेरिका सहित पूरी दुनिया में राष्ट्रपति जो बाइडन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की जोड़ी को उम्मीद और संतुलन के नए अध्याय के तौर पर देखा जा रहा है। इस जोड़ी को विरासत में पिछली सरकार से जो कुछ मिला, उसमें वह अमर्यादा और उद्दंड रवैया भी शामिल है, जो तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न सिर्फ मुल्क के बाहर बल्कि अपने लोगों के बीच भी दिखाया। इन सबको एक साथ पटरी पर लाना बाइडन और हैरिस के लिए कहीं से आसान नहीं साबित होने वाला। पिछले साल जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद वहां सामाजिक टकराव और उसके खिलाफ विरोध का आलम अभी तक थमा नहीं है।

अलबत्ता हालत को सद्भाव में बदलने की कोशिश वहां की सरकार जरूर लगातार कर रही है। अटलांटा में हुई हालिया गोलीबारी से वहां हालात एक बार फिर से काफी खराब हो गए हैं। एशियाई-अमेरिकी समुदाय के नेताओं से मिलने के बाद अटलांटा में एमोरी विश्वविद्यालय में बोलते हुए बाइडन ने भी स्वीकार किया कि पिछले साल से एशियाई-अमेरिकियों के खिलाफ नफरत बेहद बढ़ गई। बाइडन ने मसाज पार्लर की गोलीबारी के बारे में कहा कि बहुत से एशियाई-अमेरिकी सड़कों पर चलने में डरते हैं, चिंता कर रहे हैं, हर सुबह जागते हुए अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता करते हैं। उन पर हमला किया गया, उन्हें दोषी ठहराया गया, प्रताड़ित किया गया, परेशान किया गया। उनके साथ मौखिक रूप से हमला किया गया, शारीरिक रूप से हमला किया गया, मार डाला गया। उन्होंने कहा कि देश कोरोना महामारी के कारण एशियाई-अमेरिकियों के बारे में नाराजगी को समझने में लोगों के गुस्से को कम करने में विफल रहा। साफ है कि बाइडन ऐसा कुछ नहीं करना चाहते जिससे लोगों का गुस्सा और बढ़े। वे इस पूरे मामले को सद्भाव और विनम्र विवेक के साथ सुलझाने के हिमायती मालूम पड़ते हैं।

हालांकि अमेरिका सहित दुनिया में एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि बाइडन की यह नीति उस अमेरिकी मानस के बीच खड़े होने की भी है, जिन्हें खासतौर पर कोरोना संकट के बाद वाकई लगने लगा है कि दूसरे और खासकर एशियाई मुल्कों से आए लोगों ने उनकी थाली छोटी कर दी है, उनके लिए हर क्षेत्र में अवसरों को कम कर दिया है। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने भी कोविड-19 महामारी के दौरान एशियाई मूल के लोगों के खिलाफ बढ़ती हिंसा को लेकर गंभीर चिंता जताई है।

उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष की हजारों घटनाओं ने असहिष्णुता, रूढ़िवादिता और दुर्व्यवहार के ‘सदियों लंबे इतिहास’ को कायम रखा। गुतारेस ने आगे कहा, ‘दुनिया ने भयावह हमले, मौखिक और शारीरिक उत्पीड़न, स्कूलों में एक-दूसरे को परेशान करना, कार्यस्थल पर भेदभाव, मीडिया तथा सोशल मीडिया मंचों पर घृणा के लिए उकसाना और शक्तिशाली पद पर काबिज लोगों की भड़काऊ भाषा को देखा।’ गुतारेस ने दो टूक कहा कि कुछ देश महिलाओं के प्रति द्वेष भी फैला रहे हैं, खासकर एशियाई महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है।

गौरतलब है कि पिछले साल जब अमेरिका में अश्वेत युवक फ्लॉयड की हत्या हुई थी तब आमतौर पर ऐसे मामलों से खुद को दूर रखने वाला विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस हिंसा के विरोध में खुलकर सामने आ गया था। डब्लूएचओ के महानिदेशक टैड्रॉस गैबरयेसस ने कहा था कि वे दुनियाभर में नस्लवाद के खिलाफ चल रहे आंदोलन का खुलकर समर्थन करते हैं क्योंकि उनका संगठन किसी भी तरह के भेदभाव को स्वीकार नहीं करता है।

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