जैसे-जैसे प्रोफेशनल महत्वाकांक्षाएं बढ़ती हैं, ऑफिस के घंटों और पर्सनल समय के बीच की सीमा धुंधली होती जा रही है। काम के लिए आपसे हर समय उपलब्ध रहने की उम्मीद की जाती है। जहां कई लोग अपने करियर में आगे बढ़ रहे हैं, वहीं एक बड़ा सवाल बना हुआ है कि आराम, रिश्तों और काम से परे ज़िंदगी के लिए असल में कितनी जगह बची है? हाल ही में LinkedIn पर एक पोस्ट ने वर्क कल्चर और रोजमर्रा की ज़िंदगी की प्राथमिकताओं के बारे में एक बड़ी चर्चा छेड़ दी है। इसमें भारत और ऑस्ट्रेलिया के अनुभवों की तुलना की गई है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया में वर्क लाइफ बैलेंस पर बहस
LinkedIn यूजर मनूराज गर्ग द्वारा शेयर की गई यह पोस्ट से पता चलता है कि इन दोनों देशों में काम और ज़िंदगी के बीच संतुलन यानी वर्क लाइफ बैलेंस कितना अलग होता है। मनूराज गर्ग ने LinkedIn पर लिखा, “मैंने ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले एक दोस्त से फ़ोन पर बात खत्म की। शाम के 4:30 बजे थे। वह एक कैफ़े में था अकेला। कोई मीटिंग नहीं। कोई कैच-अप नहीं। कोई लैपटॉप नहीं। कोई AirPods नहीं। बस, कॉफ़ी। बैठना। उसका दिन खत्म हो चुका था। कोई ‘जल्दी वाला फ़ोन’ नहीं। कोई ‘बाद में बात करने’ का वादा नहीं। लॉग ऑफ करने से पहले कोई ‘बस एक आखिरी चीज़’ नहीं। अब वह घर जाएगा। समय पर रात का खाना। शायद साइकिल चलाना। शायद गोल्फ़ का एक राउंड। या बस अपनी पत्नी के साथ समुद्र तट पर एक लंबी सैर। रात 10 बजे तक सो जाना।”
मनूराज गर्ग ने बताया कि यह कोई असामान्य दिनचर्या नहीं थी, बल्कि ऑस्ट्रेलिया में एक सामान्य दिन था, जो भारत में काम करने के आम तरीकों से बिल्कुल अलग है। उन्होंने आगे कहा, “भारत में रात के 8:30 बजे- ऑफिस की लाइटें अभी भी जल रही होती हैं। ट्रैफ़िक में गाड़ियों की ब्रेक लाइटें चमक रही हैं। एक हाथ स्टीयरिंग पर, एक आंख WhatsApp पर। ‘2 मिनट में जुड़ रहा हूं’। ‘क्या हम जल्दी से इसकी समीक्षा कर सकते हैं?’ रविवार की शाम- लैपटॉप खुलता है। प्रेजेंटेशन खुलती है। ज़िंदगी बंद हो जाती है। यह सब सोमवार सुबह की समीक्षा के लिए होता है।”
यूजर का पोस्ट वायरल
मनूराज गर्ग के अनुसार भारत में कई प्रोफेशनल करियर में शानदार मुकाम हासिल कर रहे हैं, फिर भी सार्थक ‘अपने लिए समय’ अक्सर उनकी पहुंच से बाहर लगता है। उन्होंने आगे समझाया, “हममें से ज़्यादातर लोग यहां अच्छा कर रहे हैं। अच्छी डिग्रियां, अच्छा करियर। अच्छी सैलरी, तेज़ी से तरक्की। लेकिन साथ ही हर दो हफ़्ते में अपने पार्टनर से बात करने के लिए तय की गई ‘डेट नाइट्स’, बच्चे आपके ‘एक फ़ोन कॉल खत्म करने’ का इंतज़ार करते रहते हैं, रात 11 बजे Swiggy से मंगाया गया खाना, स्क्रीन पर बिताए गए समय के मुकाबले चलने के कदम (Step Count) कम होना, स्वास्थ्य रिपोर्ट के मुकाबले शेयर बाज़ार पर ज़्यादा नजर रखना। और इन सबके नीचे एक शांत, लगातार बना रहने वाला दबाव। क्या मैं काफ़ी कर रहा हूं? काफ़ी कमा रहा हूं? काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा हूं? क्योंकि कोई और तो हमेशा ही ऐसा कर रहा होता है। ऑस्ट्रेलिया में काम ज़िंदगी में फिट बैठता है। भारत में ज़िंदगी काम के इर्द-गिर्द घूमती है। मैं यह नहीं कह रहा कि इनमें से कोई एक सही है। लेकिन यह आपको सोचने पर मजबूर जरूर करता है: क्या टियर-1 भारत ने विलासिता के लिए अपनी बुनियादी चीज़ों से समझौता कर लिया है?”
यूजर्स कर रहे बहस
इस पोस्ट पर यूजर्स की तुरंत प्रतिक्रियाएं आने लगीं। यूजर्स ने इन बातों से खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया। एक यूजर ने लिखा, “यह बात मेरे दिल को छू गई! लंदन में काम करने के बाद अब भारत लौटने पर, यह फ़र्क मैंने सिर्फ़ देखा ही नहीं, बल्कि इसे खुद जिया है। लेकिन मैं कहूंगा कि यह कोई फ़ैसला नहीं, बल्कि एक तरह का समझौता है। भारत में हमारे पास ऐसी चीज़ें हैं जो दुनिया के मानकों के हिसाब से सचमुच विलासितापूर्ण हैं- चाहे वह घर का काम करने वाला हो, रसोइया हो, ड्राइवर हो, या कोई ऐसा व्यक्ति जो किराने का सामान लाने, कपड़े धोने और बर्तन मांजने जैसे काम संभाल ले। ये वे काम हैं जो विदेशों में आपकी शाम का काफ़ी समय चुपचाप खा जाते हैं। लंदन में, ‘मिलकर घर के काम करना’ एक रोज़मर्रा की गतिविधि है, और कभी-कभी तो यह आपस में जुड़ाव बढ़ाने का एक जरिया भी बन जाता है। तो हां भारत में काम का असर ज़िंदगी पर ज़्यादा पड़ता है। लेकिन ज़िंदगी में भी आपको ज़्यादा मदद और सहारा मिलता है। विदेशों में आपको अपनी शामें वापस मिल जाती हैं। भारत में आपकी सुबह के कामों का ध्यान रखा जाता है। दोनों में से कोई भी पूरी तरह से सही नहीं है। दोनों ही अपने-आप में काफ़ी हैं!”
एक अन्य यूज़र ने टिप्पणी की, “इन सब बातों के पीछे जो एक लगातार और खामोश दबाव बना रहता है कि क्या मैं काफ़ी काम कर रहा हूं, काफ़ी कमा रहा हूं, या काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा हूं। यही वह पहलू है जो इस चर्चा को सिर्फ़ ‘काम और ज़िंदगी के बीच संतुलन’ (work-life balance) से कहीं ज़्यादा अहम बना देता है। यह दबाव मुख्य रूप से आपकी नौकरी की वजह से नहीं आता। बल्कि यह एक ऐसे तुलनात्मक माहौल से पैदा होता है, जिसे खास तौर पर इस तरह से तैयार किया गया है कि आपको हमेशा यही महसूस हो कि आप कभी भी ‘काफ़ी’ नहीं हैं, और वह स्थिति आपकी पहुंच से हमेशा बाहर ही रहेगी।”
एक अन्य यूजर ने आगे कहा, “यह सोचने लायक एक बहुत ही बढ़िया बात है। अगर हम अपनी सेहत की रिपोर्ट के बजाय अपनी आर्थिक रिपोर्ट पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं, तो हमें यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि भविष्य में यही आर्थिक रिपोर्ट हमारी उस सेहत को ठीक करवाने के काम आएंगी, जिसकी हमने पहले कभी परवाह ही नहीं की।”
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साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की टिकट से चुनाव लड़ने वाली पसुपुलेटी माधवी लता का एक वीडियो इनदिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो जिसे माधवी ने खुद शेयर किया है में उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल-1 स्थित महिला प्रार्थना कक्ष में दुर्गा स्तुति पढ़ते देखा और सुना जा सकता है। पढ़ें पूरी खबर
