Google Trends: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ‘एशिया में जलवायु की स्थिति 2025’ रिपोर्ट ने महाद्वीप में तेजी से बढ़ते जलवायु संकट की गंभीर तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार 1991-2025 के दौरान एशिया में तापमान वृद्धि की दर 1961-1990 की तुलना में लगभग दोगुनी रही, जो वैश्विक औसत से भी अधिक है। वर्ष 2025 एशिया के सबसे गर्म वर्षों में से एक रहा, जिसमें अभूतपूर्व समुद्री गर्मी और व्यापक समुद्री लू दर्ज की गई।
रिपोर्ट बताती है कि 2025 में एशियाई भूभाग का तापमान 1991-2020 के औसत से 0.96 डिग्री सेल्सियस और 1961-1990 के आधार से लगभग 1.9 डिग्री सेल्सियस अधिक था। हालांकि दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों, विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप में, सक्रिय मानसून वर्षा के कारण अपेक्षाकृत कम तापमान दर्ज किया गया, जबकि अन्य अधिकांश क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक रहा।
WMO ने यह भी स्पष्ट किया कि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से एशिया में गर्मी का रुझान लगातार बढ़ा है और भूमि समुद्र की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रही है, जैसा कि IPCC की छठी आकलन रिपोर्ट में भी बताया गया है।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब विनाशकारी रूप ले रहे हैं। रिपोर्ट में हिमनदी झीलों के फटने से बाढ़, पूर्वी एशिया में भीषण गर्मी, पश्चिमी एशिया में सूखा और दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से आई बाढ़ जैसी घटनाओं का उल्लेख किया गया है। भारत के उत्तरकाशी में अचानक बाढ़ और श्रीलंका में चक्रवात ‘दितवाह’ के प्रभाव से तमिलनाडु में भी बाढ़ दर्ज की गई।
वियतनाम में लंबे समय तक चली बाढ़ से लगभग 1.9 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जबकि श्रीलंका में 640 लोगों की मौत और भारी विस्थापन हुआ, जिससे देश के GDP का लगभग 4% प्रभावित हुआ। पूर्वी एशिया में जापान, चीन और दक्षिण कोरिया में अब तक की सबसे गर्म गर्मियाँ दर्ज की गईं, जिसमें जापान का औसत तापमान 2.36 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 2025 में एशिया के अधिकांश समुद्री क्षेत्रों में तीव्र समुद्री लू चली, जिसने पारिस्थितिकी तंत्र, मत्स्य उद्योग और तटीय आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित किया यह प्रवृत्ति भविष्य में और अधिक गंभीर संकट का संकेत देती है।
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इस समय उत्तर और मध्य भारत का एक बड़ा हिस्सा भीषण लू की चपेट में है। कई जगहों पर तापमान 44-46 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। भारत जैसे देश के लिए गर्मी कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसके साथ हमारा रिश्ता अब बदल रहा है। ऐसा इसलिए है कि इंसानों ने वैश्विक जलवायु को बदल दिया है। बीते दस साल पूरी दुनिया में अब तक के सबसे गर्म साल रहे हैं। हमने अपने आसपास की जलवायु को भी बदल दिया है। हमने अपने घर और शहर बनाने का तरीका, अपनी जीवनशैली और प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को भी बदल दिया है। इसकी वजह से बढ़ती गर्मी के हिसाब से खुद को ढालना अब हमारे लिए और भी मुश्किल हो गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
