Google Trends: दुनिया अब ऐसे दौर की ओर बढ़ रही है जहां साफ हवा में सांस लेना भी एक बड़ा स्वास्थ्य जोखिम बन सकता है। ताजा अध्ययनों में यह चेतावनी सामने आई है कि आने वाले दशकों में वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियां और समय से पहले मौतों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है।

वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार वायु प्रदूषण को वैश्विक स्तर पर सबसे घातक पर्यावरणीय खतरा माना जाता है। यह फेफड़ों के कैंसर, अस्थमा, हृदय रोग, श्वसन संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियों के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। यहां तक कि कनाडा जैसे विकसित देशों में भी हर साल लगभग 17,000 लोगों की समय से पहले मौत और अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान इससे जुड़ा हुआ पाया गया है।

औद्योगिक गतिविधियों और जंगलों की आग से निकलने वाला धुआं वायुमंडल को बेहद तेजी से दूषित कर सकता है। कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि बाहरी हवा सीधे स्वास्थ्य पर हमला करने लगती है और लोगों को तुरंत बीमार करने की स्थिति पैदा हो जाती है।

जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और ज्यादा गंभीर बना रहा है। तापमान में बढ़ोतरी, बदलती हवाओं की दिशा और अनियमित बारिश का पैटर्न प्रदूषकों को और सक्रिय बनाता है, जिससे हवा में जहरीले कण तेजी से फैलते और जमा होते हैं। एक रिसर्च में अनुमान लगाया गया है कि 2100 तक अमेरिका में करीब 10 करोड़ लोग गर्मियों के दौरान अस्वस्थ हवा में सांस लेने को मजबूर हो सकते हैं, जो वर्ष 2000 की तुलना में कई गुना अधिक है।

अध्ययन यह भी बताता है कि अगर प्रदूषण पर काबू पाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो लोगों के पास केवल दो ही विकल्प बचेंगे—या तो घरों के अंदर रहकर खुद को बचाना या फिर गंभीर बीमारियों और मृत्यु के बढ़ते खतरे को झेलना। यह निष्कर्ष वैश्विक जलवायु, अर्थव्यवस्था और वायुमंडलीय मॉडलिंग पर आधारित है।

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शोध में यह भी सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते स्वास्थ्य चेतावनियों और जोखिमों का असर संवेदनशील समूहों पर दोगुना तक बढ़ सकता है। इनमें शिशु, छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और पहले से हृदय या फेफड़ों की बीमारी, कैंसर, डायबिटीज और मानसिक रोगों से जूझ रहे लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। बाहर काम करने वाले और खुले वातावरण में एक्सरसाइज करने वाले लोग भी जोखिम के दायरे में आते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लोग वायु गुणवत्ता चेतावनियों को गंभीरता से लें, तो प्रदूषण के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसमें भारी शारीरिक गतिविधियों से बचना, घर के अंदर हवा को साफ रखना और ज्यादा प्रदूषण की स्थिति में N95 या P99 मास्क का उपयोग करना शामिल है।

रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन का असर जंगलों की आग को और बढ़ा सकता है, जिसे कई मौजूदा अध्ययनों में पूरी तरह शामिल नहीं किया गया है। खासकर कनाडा जैसे देशों में जंगलों की आग से उठने वाला धुआं सूक्ष्म कणीय प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ता प्रदूषण पिछले कई दशकों में बनाए गए पर्यावरणीय नियमों से मिले सुधारों को भी कमजोर कर सकता है। अनुमान है कि इससे वायु गुणवत्ता में अब तक की आधी प्रगति भी खतरे में पड़ सकती है।

विशेषज्ञों ने साफ किया है कि इस संकट से निपटने के लिए केवल चेतावनियां ही नहीं, बल्कि उत्सर्जन में बड़ी कटौती और अनुकूलन रणनीतियों की भी जरूरत होगी। इसमें इमारतों की एयर-सीलिंग, बेहतर वेंटिलेशन, फिल्ट्रेशन सिस्टम और स्वच्छ इनडोर स्पेस जैसी सुविधाओं को मजबूत करना जरूरी माना गया है।

लू से राहत की उम्मीद, मौसम बदलेगा करवट

देश के कई हिस्सों में इन दिनों भीषण गर्मी और लू ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि गुरुवार तक तेज गर्मी से राहत मिलने की संभावना नहीं है, लेकिन शुक्रवार से हालात में सुधार शुरू हो सकता है।

मौसम विभाग के अनुसार पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में 28 और 31 मई के बीच बारिश, गरज-चमक और तेज हवाओं के साथ मौसम में बदलाव देखने को मिल सकता है। कुछ इलाकों में बिजली गिरने और तेज आंधी की भी आशंका जताई गई है।

वहीं जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और राजस्थान में 28–29 मई के दौरान 50–60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने और आंधी आने की संभावना है। इसके साथ ही कई राज्यों में ओलावृष्टि भी लोगों के लिए नई चुनौती बन सकती है।

मौसम विभाग ने यह भी बताया है कि 26 और 27 मई को उत्तर भारत के कई हिस्सों में रात के समय गर्म हवाओं का असर जारी रह सकता है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में लू का असर और तेज रहने का अनुमान है।

पश्चिमी राजस्थान में 26 से 28 मई के दौरान भीषण लू चलने की चेतावनी जारी की गई है। हालांकि 27 मई के बाद अधिकतम तापमान में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा, जबकि 28–29 मई को तापमान में गिरावट और फिर बाद में हल्की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

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देश में मौसम विभाग (IMD) जल्द ही देश में लू घोषित करने के पुराने मानदंडों में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। विभाग का मानना है कि मौजूदा नियम भारत की अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों को, खासकर तटीय राज्यों और दक्षिण भारत में, ठीक से नहीं समझ पाते। इसी कारण कई बार गंभीर गर्मी और उमस होने के बावजूद लू की आधिकारिक चेतावनी जारी नहीं हो पाती। सूत्रों के मुताबिक नया सिस्टम तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से तैयार किया जा रहा है। इसमें यह देखा जाएगा कि केवल एक मौसम केंद्र के आंकड़ों के बजाय कई इलाकों के तापमान और नमी के स्तर को मिलाकर लू घोषित की जाए। अभी तक यह जरूरी है कि दो केंद्रों पर तय सीमा से ज्यादा तापमान रिकॉर्ड हो, तभी लू की घोषणा की जाती है। केरल जैसे राज्यों में यह शर्त अक्सर पूरी नहीं हो पाती, इसलिए वहां खतरे की स्थिति के बावजूद आधिकारिक अलर्ट जारी नहीं हो पाता। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक