गुजरात के सूरत से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक कहानी जो एटीएम से महज 10 हजार रुपये निकालने से शुरू हुई थी वो तीन लाख से अधिक के हर्जाने के साथ खत्म हुई। कंज्यूमर फोरम ने बैंक को एक ऐसा आदेश दिया, जो अब चर्चा का विषय बन गया है। आइये जानते हैं पूरा मामला क्या है।
दरअसल, साल 2017 में 18 फरवरी को सूरत के उधना इलाके में एक ग्राहक ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एटीएम से 10,000 रुपये निकालने की कोशिश की। प्रक्रिया के अनुसार उन्होंने अपना कार्ड मशीन में डाला और पिन इंटर किया और पैसे का इंतजार करने लगे। हालांकि, मशीन से न तो कैश निकला और न ही रसीद छपी। जबकि कुछ ही देर बाद, उन्हें एक मैसेज मिला जिसमें बताया गया था कि उनके खाते से 10,000 रुपये कट गए हैं।
इस घटना ने उन्हें चौंका दिया। मामले में उन्होंने 21 फरवरी को बैंक ऑफ बड़ौदा की डुंभाल ब्रांच में लिखित शिकायत दर्ज कराई। मार्च से मई 2017 तक, उन्होंने ईमेल के जरिए कई बार फॉलो-अप किया। साथ ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और दूसरे संबंधित अधिकारियों से भी संपर्क किया। इसके अलावा, उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से CCTV फुटेज पाने के लिए सूचना के अधिकार के तहत अर्जी भी दी।
हालांकि, उनकी सारी कोशिशें नाकाम रहीं और उन्हें न तो संतोषजनक जवाब मिला और ना ही पैसे। आखिरकार, 20 दिसंबर, 2017 को, उन्होंने उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान, बैंक ऑफ बड़ौदा ने दलील दी कि एटीएम एसबीआई का था और उनके रिकॉर्ड में लेन-देन “सफल” दिखा रहा था, इसलिए बैंक इसके लिए जिम्मेदार नहीं है।
हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि बैंक को लेन-देन से जुड़ा ठोस सबूत देना होगा। आयोग ने यह भी कहा कि RBI के नियमों के मुताबिक, रकम पांच दिनों के अंदर वापस कर दी जानी चाहिए थी, जो बैंक करने में नाकाम रहा। अपने आखिरी आदेश में, आयोग ने बैंक ऑफ बड़ौदा को निर्देश दिया कि वो मूल 10,000 रुपये 9 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ वापस करे।
साथ ही देरी के लिए प्रति दिन 100 रुपये का मुआवजा दे। 26 फरवरी, 2026 तक, देरी 3,288 दिनों तक पहुंच चुकी थी, ऐसे में मुआवजे की रकम बढ़कर 3,28,800 रुपये हो गई। बैंक को मानसिक उत्पीड़न के लिए 3,000 रुपये और कानूनी खर्चों के लिए 2,000 रुपये देने का भी आदेश दिया गया।
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