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पीएम नरेंद्र मोदी के इंटरव्‍यू पर परेश रावल ने ली चुटकी, कहा- जल रहे पत्रकारों के लिए बर्नोल का फैमिली पैक लगेगा

सनी देओल नाम के एक यूजर ने लिखा, ' आज का सुविचार "बाप का जूता भी बादाम की तरह होता है, जितना खाओगे उतनी अक़्ल आएगी।' एक यूजर ने लिखा है अब ये क्रीम नये ब्रांड नेम जर्नाल के नाम से आया है।'

बीजेपी सांसद परेश रावल।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू पर गुजरात बीजेपी के सांसद परेश रावल ने पत्रकारों पर चुटकी ली है। हिन्दी न्यूज चैनल जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी के साथ पीएम का इंटरव्यू ऑन एयर होने के बाद परेश रावल ने चुटकी लेते हुए एक ट्वीट किया है। परेश रावल ने लिखा, ‘ जी टीवी पर नरेंद्र मोदी जी के इंटरव्यू के बाद बर्नोल ने जल रहे पत्रकारों के लिए फैमिली पैक लाने का फैसला किया है।’ बता दें कि बर्नोल एक ऐसी क्रीम है जिसका इस्तेमाल आग से जलने के बाद जख्म को मिटाने के लिए किया जाता है। सांसद परेश रावल का यह ट्वीट जबर्दस्त वायरल हुआ है। मात्र दो घंटे भीतर इस इस ट्वीट को ढाई हजार लोग लाइक कर चुके हैं जबकि लगभग एक हजार लोग इसे रिट्वीट कर चुके हैं। इस ट्वीट पर कई मजेदार और तल्ख टिप्पणियां आईं है। सनी देओल नाम के एक यूजर ने लिखा, ‘ आज का सुविचार “बाप का जूता भी बादाम की तरह होता है, जितना खाओगे उतनी अक़्ल आएगी।’ एक यूजर ने लिखा है अब ये क्रीम नये ब्रांड नेम जर्नाल के नाम से आया है।’

मयूर पटेल नाम के एक यूजर ने लिखा, ‘बोलो मोदीजी को एक बार रवीश कुमार जी से इंटरव्यू दे दो फिर पता चलेगा कि बरनोल की जरूरत किसको है।’ एक यूजर ने लिखा, ‘बर्नाल को अब डालडा साइज पैक में लाने की जरूरत है।’  अन्ना साहेब नाम के एक यूजर ने लिखा कि बाबू भाई मोदी को बोलिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करें, सुधीर चौधरी को जानता कौन है।’ धीरज कुमार ने लिखा, ‘यह एक प्रायोजित इंटरव्यू था सवाल औऱ जवाब दोनों फिक्स थे विस्थापित कश्मीरी पंडितों पर एक भी सवाल नही और ना ही राम मंदिर धारा 370 मोदी जी की मीठे सवालों की आदत छोड़ देनी चाहिए।’

बता दें कि समाचार चैनल ‘जी न्यूज’ को पीएम नरेंद्र मोदी ने एक लंबा साक्षात्कार दिया है। इस इंटरव्यू में मोदी ने देश के ज्वलंत मुद्दे-जैसे, रोजगार, चुनाव, विदेश नीति पर अपनी राय रखी है। पीएम मोदी ने राज्यों की विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक ही बार में करवाने पर जोर दिया है। पीएम ने कहा कि चुनाव भी त्यौहारों की तरह होने चाहिए, जैसे कि होली में आप रंग फेंकते और कीचड़ भी फेंकते हैं और फिर अगली बार तक के लिए भूल जाते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ लॉजिस्टिक के नजरिए से देखें तो ऐसा लगता है कि देश हमेशा चुनावी मूड में हैं।’’ उन्होंने कहा कि चुनावों की तिथियां भी तय होनी चाहिए, ताकि नेता और नौकरशाह पूरे साल चुनाव कराने और चुनाव प्रचार की प्रक्रिया में शामिल नहीं रहे।

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