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निशाकांत ओझा : स्वदेशी हमलावर ड्रोन बनाने में जुटे

आने वाले कुछ महीनों में भारत के पास खुद का हमलावर ड्रोन होगा, जो पूरी तरह ‘मेक इन इंडिया’ पर आधारित होगा।

Researchनिशाकांत ओझा। फइल फोटो।

आने वाले कुछ महीनों में भारत के पास खुद का हमलावर ड्रोन होगा, जो पूरी तरह ‘मेक इन इंडिया’ पर आधारित होगा। इसे बनाने का काम शुरू हो चुका है। यह अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित होगा, जो दुश्मनों को मार गिराने के साथ-साथ आतंकवाद और साइबर हमले को रोकने में भी कारगर भूमिका निभाएगा। देश के अर्धसैनिक बलों के लिए साइबर सुरक्षा और आतंकवाद रोधी तकनीक पर काम करने वाले डॉ. निशाकांत ओझा की देखरेख में इसका निर्माण चल रहा है।

निशाकांत इलाहाबाद से ताल्लुक रखते हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई इलाहाबाद में ही हुई। इसके बाद डेनमार्क से उन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल की। वे रूस और सूडान में काम कर चुके हैं। कई मिडिल ईस्ट कंट्री में बतौर सुरक्षा सलाहकार सेवाएं दे चुके हैं। अभी वे ब्रॉडकास्ट इंजीनियरिंग कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड (बीईसीआइएल) में बतौर साइबर और वायु सुरक्षा सलाहकार कर रहे हैं।

निशाकांत कहते हैं कि हमारे देश के ज्यादातर रक्षा उपकरण बाहर से आते हैं। जो ड्रोन हम बाहर से खरीदते हैं उसके लिए 200 करोड़ से ज्यादा रकम चुकानी पड़ती है, जबकि हम इसे अपने देश में 40 से 50 करोड़ में खुद बना सकते हैं। दूसरी बात कि ये ड्रोन एकदम से नए नहीं होते हैं। पुरानी तकनीक ही हमें खरीदनी पड़ती है।

वे कहते हैं कि इसके साथ ही सुरक्षा के लिहाज से भी दूसरे देशों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है, क्योंकि जब भी कोई देश किसी दूसरे देश को कोई सॉफ्टवेयर देता है तो उसका एक्सेस कहीं न कहीं अपने पास रख लेता है। आप चीन का ही उदाहरण ले लीजिए। देश में कई जगहों पर चाइनीज कैमरे लगे हैं। इसके जरिए चीन हमारे यहां की जानकारी लेते रहता है। इस तरह की कई चीजें सामने आ चुकी हैं। वे कहते हैं कि हाल ही में मैंने छह लाख से ज्यादा ऐसे कैमरों के बारे में सरकार को जानकारी दी थी।

निशाकांत कहते हैं कि मैं दूसरे देशों को रक्षा और साइबर सिक्योरिटी में हेल्प करता हूं। तो मैं अपने देश के लिए कदम क्यों नहीं उठा सकता। यही सोचकर हमने काउंटर ड्रोन पर काम करना शुरू किया। निशाकांत कहते हैं कि हम तकनीक के हस्तांतरण पर काम कर रहे हैं। ऐसे कई छोटे- छोटे देश हैं जिनके पास तकनीक तो है, लेकिन संसाधन नहीं है। इसी तरह देश में कई स्टार्टअप कंपनियां हैं, जिनके पास योजनाएं तो हैं, लेकिन फंड नहीं है। हम इन दोनों की मदद ले रहे हैं। जिन देशों से हम तकनीक लेंगे, उन्हें हम उसकी रॉयल्टी उपलब्ध कराएंगे। हम पूरी तरह मेक इन इंडिया के तर्ज पर काम कर रहे हैं। इसके सभी पुर्जे और सॉफ्टवेयर भारत में ही बनेंगे।

निशाकांत बताते हैं कि यह ड्रोन पूरी तरह मानव रहित होगा। इसमें रडार भी है। इसकी प्रोग्रामिंग इस तरह से की जाएगी कि ये सेल्फ आॅपरेट भी हो सके और जरूरत पड़ने पर इसे आॅफिस में बैठकर भी नियंत्रित किया जा सके। एक बार चार्ज करने के बाद यह चार से पांच दिनों तक हवा में निगरानी कर सकता है। बैटरी कम होने या जरूरत पड़ने पर इसे वापस भी बुलाया जा सकता है। इसकी रफ्तार 440 किलोमीटर प्रति घंटा रहेगी और यह 55 हजार फीट की ऊंचाई तक जाकर काम कर सकेगा।

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