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अंतरिक्ष में कचरे की सफाई का अभियान

अंतरिक्ष में अपनी पैठ बनाने के चक्कर में दुनिया के अधिकांश देश ज्यादा से ज्यादा उपग्रह प्रक्षेपित कर रहे हैं। ऐसे में अंतरिक्ष में जमा हो रहे मलबे का खतरा बढ़ रहा है। मानव निर्मित मलबे आठ किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से धरती का चक्कर लगा रहे हैं। दूसरी ओर, उपग्रहों के टकराने से बना मलबा 40 हजार किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चक्कर काटता है।

सांकेतिक फोटो।

मानव निर्मित मलबों के ये टुकड़े विभिन्न उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। ऐसे मलबों की सफाई में जापान की चार कंपनियां तेजी से काम कर रही हैं और बेहतर व्यापार के अवसर देख रही हैं। अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए गए ढेरों उपग्रहों का मलबा जमा हो गया है। ये मलबे धरती का चक्कर लगा रहे हैं।

हालात यह है कि अगर कोई नया उपग्रह इन मलबों के ढेर से टकराएगा तो ना सिर्फ करोड़ों का नुकसान होगा, बल्कि शोध परियोजना भी अधूरी रह जाएगी। मानव निर्मित मलबों के ये टुकड़े विभिन्न उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। ऐसे मलबों की सफाई में जापान की चार कंपनियां तेजी से काम कर रही हैं और बेहतर व्यापार के अवसर देख रही हैं। वे उन समाधानों को विकसित करने में जुटी हैं, जिनकी बदौलत आने वाले दिनों में अंतरिक्ष यात्रा अधिक सुरक्षित हो सकेगी।

दरअसल, अंतरिक्ष में पैठ बनाने की कोशिश में मलबा बढ़ता जा रहा है। अधिकांश देश अंतरिक्ष में अपने ज्यादा से ज्यादा उपग्रह छोड़ रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले समय में अंतरिक्ष में ऐसे मलबों की मात्रा और बढ़ेगी। अंतरिक्ष में मलबे आठ किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से धरती का चक्कर लगा रहे हैं। उपग्रहों के टकराने से बना मलबा 40 हजार किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चक्कर काटता है। इतनी रफ्तार से चक्कर काटता एक मूंगफली का दाना भी टकराने पर ग्रेनेड जैसा असर करता है। अंतरिक्ष का कचरा पृथ्वी में पलने वाले जीवन के लिए भी खतरा है।

जापानी कंपनी एस्ट्रोस्केल 2013 में बनाई गई थी और इसकी चार शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, इजराइल व सिंगापुर में हैं। इस कंपनी ने इसी साल 22 मार्च को कजाखस्तान के बाइकोनुर कॉस्मोड्रोम से छोड़े गए सोयुज रॉकेट में भेजे अपने एल्सा-डी डिमांस्ट्रेशन क्राफ्ट के जरिए अपनी ‘एंड आॅफ लाइफ सविर्सेज’ शुरू कर दी। एल्सा-डी दो उपग्रहों से मिलकर बना है जो एक के ऊपर एक जुड़े हुए हैं। इसमें एक 175 किलोग्राम वाला ‘सर्विसर सैटेलाइट’ है और दूसरा 17 किलो वाला ‘क्लाइंट सैटेलाइट’ है। इसमें एक चुंबकीय ‘डॉकिंग मेकेनिज्म’ भी लगा है और खराब पड़ चुके उपग्रहों और मलबे के बड़े टुकड़ों को हटाने का काम इसी उपग्रह के जरिए होता है।

जापान के अलावा यूरोपीय अंतरिक्ष एजंसी (ईएसए) भी अंतरिक्ष में मौजूद कूड़े को साफ करने के लिए काम कर रही है। वह 2023 में एक गारबेज रोबोट को लांच करने की तैयारी कर रही है। इस स्पेस रोबोट में एक हाथ होगा जो सैटेलाइट को पकड़ कर वापस धरती पर ले आएगा। इस कूड़े को साफ करने के लिए कई उपायों पर काम किया रहा है। वैज्ञानिकों का यह विचार है कि कचरे को अंतरिक्ष में ही जला दिया जाए। जर्मनी की अंतरिक्ष एजंसी डीएलआर इसके लिए एक लेजर तकनीक विकसित कर रही है। लेजर किरण के प्रहार (लेजर शॉट) से मलबे को वहीं भस्म कर दिया जाएगा।

‘इलेक्ट्रो नेट’ पर काम कर रही नासा

अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी नासा भी एक ‘इलेक्ट्रो नेट’ पर काम कर रही है। यह जाल एक बड़े इलाके में मौजूद कचरे को बांधेगा और फिर से धरती के वायुमंडल में लाएगा। पृथ्वी के वायुमंडल से दाखिल होते समय ज्यादातर कचरा खुद जल जाएगा, लेकिन इस विचार पर अभी ठोस काम होना बाकी है। इसके अलावा जापान की अंतरिक्ष एजंसी जाक्सा के पास ‘इलेक्ट्रोडायनेमिक माइन’ का प्रपोजल है। सात सौ मीटर लंबी इलेक्ट्रोडायनेमिक सुरंग स्टेनलेस स्टील और एल्युमीनियम से बनाई जाएगी। यह सुरंग कचरे की तेज रफ्तार को धीमा करेगी और उसे धीरे-धीरे वायुमंडल की तरफ धकेलेगी।

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