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तकनीकी गड़बड़ी के कारण 40 मिनट की देरी से लॉन्च हुआ GSLV-F05 रॉकेट

इसरो ने GSLV-F05 में स्वदेशी तकनीक से निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग किया है। इससे पहले इसरो रूस निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग कर रहा था।
Author नई दिल्ली | September 8, 2016 17:28 pm
इसरो ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन से लैस प्रक्षेपण यान GSLV-F05 का परीक्षण किया। (Source: Express Photo)

भारतीय अंतरीक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने गुरुवार को सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल GSLV-F05 के माध्यम से  मौसम का सही अनुमान लगाने वाले एडवांस सैटेलाइट इनसैट-3डीआर को सफलता पूर्वक लॉन्च कर दिया। तकनीकी गड़बड़ी के कारण जीएसएलवी-एफ05 का प्रक्षेपण निर्धारित समय से 40 मिनट के लिए टालना पड़ा। पहले यह प्रक्षेपण गुरुवार शाम 4 बजकर 10 मिनट पर होना था लेकिन किसी तकनीकी गड़बड़ी के कारण इसे शाम 4 बजकर 50 मिनट पर लॉन्च किया गया।

यह प्रक्षेपण सफल रहता है तो इसरो के लिए मील का पत्थर साबित होगा। इसरो द्वारा कुछ दिनों पहले ही स्वदेशी स्क्रैमजेट इंजन के सफल परीक्षण किए जाने के बाद यह देश के लिए एक और उपलब्धि होगी। हम आपको बता रहे हैं इसरो के इस अत्याधुनिक लॉन्च व्हीकल की खासियत के बारे में…

क्या है जीएसएलवी: जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) इसरो द्वारा विकसित पूर्ण स्वदेशी प्रक्षेपण यान है। जीएसएलवी ऐसा मल्टी स्टेज रॉकेट है जो दो टन से अधिक वजनी उपग्रह को पृथ्वी से 36,000 कि.मी. की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित करता है। यह रॉकेट अपना कार्य तीन चरण में पूरा करते हैं। इसके तीसरे यानी अंतिम चरण में सबसे अधिक बल की आवश्यकता होती है। रॉकेट की यह आवश्यकता केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। लिहाजा बिना क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट का निर्माण मुश्किल होता है। इसरो के लिए जीएसएलवी-एफ05 इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्रायोजेनिक अपर स्टेज को ले जाते हुए इसकी पहली संचालन उड़ान है।

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बहुत अधिक वजनी उपग्रह ले जाने में है सक्षम: अधिकतर उपग्रह दो टन से अधिक वजनी होते हैं। विश्व भर में छोड़े जाने वाले 50 प्रतिशत उपग्रह इसी वर्ग में आते हैं। जीएसएलवी रॉकेट इस भार वर्ग के दो तीन उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में ले जाकर निश्चित कि.मी. की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है। यही इसकी की प्रमुख विशेषता है।

क्रायोजेनिक इंजन क्या है:जीएसएलवी रॉकेट में प्रयुक्त होने वाला ईंधन बहुत कम तापमान पर भरा जाता है, इसलिए ऐसे इंजन क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन कहलाते हैं। इस तरह के रॉकेट इंजन में अत्यधिक ठंडी और लिक्विफाइड गैसों को ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। सॉलिड ईंधन की अपेक्षा यह कई गुना शक्तिशाली सिद्ध होते हैं और रॉकेट को बूस्ट करने में मददगार साबित होते हैं। विशेषकर लंबी दूरी और भारी रॉकेटों के लिए यह तकनीक आवश्यक होती है।

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पीएसएलवी बनाम जीएसएलवी: इसरो इससे पहले ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान(पीएसएलवी) की ममद से उपग्रह प्रक्षेपण में काफी सफलता प्राप्त की है। जीएसएलवी अपने डिजाइन और सुविधाओं में पीएसएलवी से बेहतर है। यह तीन श्रेणी वाला प्रक्षेपण यान है, जिसमें पहला चरण सॉलिड, दूसरा लिक्विड प्रापेल्ड तथा तीसरा क्रायोजेनिक इंजन आधारित होता है। जीएसएलवी का पहले और दूसरे चरण में पीएसएलवी में इस्तेमाल होने वाली तकनीक ही ली गई है। तीसरे चरण के लिए इसरो ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का आविष्कार किया है। इससे पहले जीएसएलवी प्रक्षेपण यान के तीसरे चरण के लिए इसरो रूस निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग कर रहा था।

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क्या होते हैं जीसेट सैटेलाइट: जियोसिंक्रोनस उपग्रह ऐसे उपग्रह होते हैं जो भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर स्थित होते हैं और वह पृथ्वी की घुर्णन गति की बराबर गति से ही उसके साथ-साथ घूमते हैं। इस तरह जहां एक ओर ध्रुवीय उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है, वहीं भूस्थिर उपग्रह अपने नाम के अनुसार पृथ्वी की कक्षा में एक ही स्थान पर स्थित रहता है। यह कक्षा पृथ्वी की सतह से 35,786 किलोमीटर ऊपर होती है।

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